Dowry Harassment Families Should Not Ignore Daughters Complaints Important Remark By High Court
'दहेज प्रताड़ना की हर शिकायत को गंभीरता से लें परिवार'
नवभारतटाइम्स.कॉम•
n NBT न्यूज, लखनऊ
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दहेज हत्या से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि दहेज प्रताड़ना की शिकायत लेकर बार-बार मायके आने वाली बेटी की बात को सामान्य वैवाहिक विवाद मानकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि ऐसी शिकायतें मदद, सुरक्षा और समय पर हस्तक्षेप की वास्तविक पुकार हो सकती हैं। परिवार की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि वह बेटी की बात पर विश्वास करे और उसकी सुरक्षा व सम्मान सुनिश्चित करने के लिए तुरंत कदम उठाए। न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति अबधेश कुमार चौधरी की पीठ ने श्रावस्ती के 2011 के दहेज हत्या मामले में दोषियों की अपील पर फैसला सुनाते हुए यह टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि दहेज उत्पीड़न झेल रही महिलाओं को अक्सर परिवार की ओर से समझौता करने, समायोजन करने या घर बचाने की सलाह दी जाती है। ऐसी सलाह कई बार उत्पीड़न करने वालों का हौसला बढ़ा देती है और पीड़िता को लगातार प्रताड़ना सहने के लिए मजबूर कर देती है। अदालत ने कहा कि दोषियों को सजा दिलाना जरूरी है, लेकिन यह उस समय किए जाने वाले हस्तक्षेप का विकल्प नहीं हो सकता, जिससे किसी महिला की जान बचाई जा सकती थी। आईपीसी की धारा 498ए और 304बी का उद्देश्य केवल अपराध के बाद दोषियों को दंडित करना नहीं, बल्कि ऐसे अपराधों को रोकना और विवाहित महिलाओं को प्रभावी कानूनी सुरक्षा देना भी है।
हाई कोर्ट ने मृतका के पति दिनेश कुमार और परिवारजन शेषराज, ननबाबू, बड़े लाल कोरी व बिट्टा देवी की धारा 304बी, 498ए आईपीसी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा चार के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि, धारा 304बी में दी गई उम्रकैद को आरोपितों द्वारा जेल में बिताई गई अवधि में बदल दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने उम्रकैद देने के पर्याप्त कारण नहीं बताए थे और हर मामले में उम्रकैद अनिवार्य नहीं है।
अदालत ने पाया कि जान गंवाने वाली मीना देवी ने अपने मायके वालों को दहेज प्रताड़ना की जानकारी दी थी। घटना से कुछ दिन पहले उसने रोते हुए बताया था कि ससुराल वाले एक लाख रुपये और बाइक मांग रहे हैं तथा धमकी दे रहे हैं।