Measures To Stop Religious Conversion Fcra Amendment Social Equality And Role Of Religious Institutions
किस तरह रोका जा सकता है धर्मांतरण
नवभारतटाइम्स.कॉम•
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 ने एक बार फिर विदेशी चंदे, धर्मांतरण और धार्मिक संस्थाओं की भूमिका पर बहस छेड़ दी है। प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक, एक नामित प्राधिकरण (Designated Authority) विदेशी अंशदान से बनी उन परिसंपत्तियों का प्रबंधन करेगा, जिन संस्थाओं का FCRA पंजीकरण समाप्त, रद्द या सरेंडर हो चुका है।
कई बदलाव । सरकार इसे प्रशासनिक सुधार बता रही है, जबकि कई NGO और चर्च से संचालित होने वाली संस्थाएं इसके जरिये सरकारी नियंत्रण बढ़ाने का आरोप लगा रहे हैं। वैसे, FCRA भारत में 1976 से लागू है। 1984 में यह और सख्त बनाया गया। 2010 में नया कानून आया और 2020 में इसमें और सख्ती बरतते हुए विदेशी धन के हस्तांतरण, प्रशासनिक खर्च और धन प्राप्ति से जुड़े नए प्रावधान जोड़े गए। बाद में भी संशोधन होते रहे।धर्मांतरण के कारण । FCRA पर चर्चा के साथ ही धर्मांतरण का मसला उठ जाता है। ईसाई मिशनरियों और चर्चों पर इस पैसे का उपयोग धर्म परिवर्तन के लिए करने का आरोप लगाया जाता है। वहीं, इन संगठनों का कहना है कि वे इसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, आपदा राहत और सामाजिक कल्याण के लिए करते हैं। दलितों, आदिवासियों और समाज के अन्य वंचित वर्गों से लोग धर्म परिवर्तन करते रहे हैं। इसका कारण सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, सम्मान की कमी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और आर्थिक अवसरों की कमी भी हो सकती है।
सीखने की जरूरत । यदि चर्च शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा के माध्यम से कमजोर वर्गों तक पहुंच बनाते हैं, तो क्या मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थाओं को भी यही तरीका नहीं अपनाना चाहिए? मंदिरों में आने वाले हजारों करोड़ रुपये के दान का बड़ा हिस्सा आधुनिक विद्यालयों, अस्पतालों, छात्रावासों, छात्रवृत्तियों, कौशल विकास केंद्रों और रोजगार सृजन पर खर्च हो तो वंचित वर्गों का जीवन बदल सकता है। यदि विदेशी धन का इस्तेमाल देशहित के खिलाफ हो तो ठोस सबूतों के आधार पर सख्त कार्रवाई हो। लेकिन, जो संस्थाएं कानून का पालन करते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सेवा के कार्य कर रही हैं, उन पर बेजा शक ठीक नहीं।
देना होगा सम्मान । कानून का उद्देश्य अवैध गतिविधियों को रोकना होना चाहिए, न कि वैध सामाजिक और मानवीय कार्यों को बाधित करना। असल बहस FCRA नहीं, भारत के सामाजिक भविष्य की है। यदि वंचित समुदायों को सम्मान, समान अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा मिले, तो धर्म परिवर्तन की प्रवृत्ति घटेगी। धार्मिक संस्थाएं जनकल्याण में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करें और सरकार पारदर्शी व निष्पक्ष नियामक की भूमिका निभाए।