राजसत्ता का गौरव

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raja bhoj the glory of kingship lies in service not arrogance
परमार वंश के महान सम्राट राजा भोज (लगभग 1010–1055 ई.) भारतीय इतिहास में केवल एक पराक्रमी शासक के रूप में ही नहीं, विद्या, साहित्य, कला और स्थापत्य के महान संरक्षक के रूप में भी स्मरण किए जाते हैं। उनके शासनकाल में धार नगरी ज्ञान और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनी। एक दिन राजा भोज साधारण वेश में अपनी प्रजा का हाल जानने निकले। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध लकड़हारा भारी गट्ठर उठाए संघर्ष करता दिखाई दिया। राजा ने बिना अपना परिचय दिए उसके सिर से गट्ठर उतारकर स्वयं अपने कंधे पर रख लिया और कुछ दूर तक उसके साथ चलते रहे। तभी लकड़हारा बोला, ‘भाई, लगता है तुम किसी अच्छे घर के हो। इतना भारी बोझ क्यों उठा रहे हो?’ राजा मुस्कुराकर बोले, ‘दूसरे का भार हल्का करना ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।’ गंतव्य पर पहुंचकर लकड़हारे ने उन्हें एक सामान्य व्यक्ति समझकर धन्यवाद दिया। तभी कुछ सैनिक वहां पहुंचे और राजा भोज को प्रणाम किया। यह देखकर वृद्ध लकड़हारा भयभीत हो उठा और क्षमा मांगने लगा। राजा भोज ने मुस्कुराकर कहा, ‘यदि राजा अपनी प्रजा का भार नहीं उठाएगा, तो उसके मुकुट का क्या मूल्य? राजसत्ता का गौरव सेवा में है, अहंकार में नहीं।’