मन को शिव में एकाग्र कर देती है कांवड़ यात्रा

Contributed byअनूप तनेजा|नवभारतटाइम्स.कॉम
kanwar yatra the spiritual path to focusing the mind on shiva
कांवड़ यात्रा का आध्यात्मिक अर्थ समुद्र मंथन की प्राचीन पौराणिक कथा में निहित है। उस समय उत्पन्न हुए 'हलाहल' विष से सृष्टि बचाने के लिए भगवान शिव ने उसका पान कर उसे अपने कंठ में रोक लिया।

विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला हो गया और उन्हें ' नीलकंठ महादेव ' का नाम मिला। विष की तीव्र जलन शांत करने के लिए भक्तों ने भगवान शिव पर पवित्र गंगाजल अर्पित किया। आज श्रावण मास में कांवड़िए गंगाजल लाकर भगवान शिव से दिव्य संरक्षण, कल्याण और सफलता की कामना करते हैं। आध्यात्मिक रूप से देखें तो कांवड़ के दोनों सिरों पर लटके पानी के कलश ब्रह्मांड की इडा (स्त्री/चंद्रमा) और पिंगला (पुरुष/सूर्य) ऊर्जाओं के संतुलन को दर्शाते हैं। चलते समय कांवड़ को संतुलित रखना दर्शाता है दुनिया की हलचल के बीच मन के पूर्ण संतुलन को। सैकड़ों किलोमीटर तक नंगे पांव, तेज धूप, बारिश के बीच की जाने वाली इस कठिन तपस्या के लिए कहते कि इससे कई जन्मों के नकारात्मक कर्म भस्म हो जाते हैं।
'बोल बम' के जयघोष और लोगों द्वारा आयोजित भंडारे मानवता को निस्वार्थ सेवा का संदेश भी देते हैं।

(लेखक ICHR में वरिष्ठ अकादमिक फेलो हैं)