Not Allopathy Vs Homeopathy Rural Healthcare Is The Real Issue
एलोपैथी बनाम होम्योपैथी का सवाल ही ग़लत
नवभारतटाइम्स.कॉम•
महाराष्ट्र में एलोपैथ डॉक्टरों ने बॉम्बे हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अपनी हड़ताल एक दिन में ही वापस ले ली, लेकिन विवाद का मुद्दा जस का तस है। इन डॉक्टरों के संगठनों- महाराष्ट्र असोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (MARD) और IMA ने अब शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन चलाने की घोषणा की है। अदालत और सरकार इस मामले में क्या रुख लेती है, इस पर सबकी नजरें होंगी। यह जनस्वास्थ्य से जुड़ा व्यापक मुद्दा है और इसके चिकित्सा के क्षेत्र में देशव्यापी व दूरगामी परिणाम होने वाले हैं।
दवा का मुद्दा । आधुनिक चिकित्सा (MBBS आदि) के क्षेत्र के डॉक्टरों को एलोपैथ और आयुर्वेद (BAMS), होम्योपैथी (DHMS), यूनानी (DUMS), प्राकृतिक चिकित्सा आदि में प्रशिक्षित डॉक्टरों को ‘आयुष डॉक्टर’ कहा जाता है। यह सच है कि आधुनिक दवाओं का कोई तोड़ नहीं, इसलिए आयुष डॉक्टर अक्सर एलोपैथी की दवाओं का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं। ग्रामीण और शहरों के सीमावर्ती इलाकों में पहुंच और सुविधा नहीं रहने के कारण खासतौर पर आयुष डॉक्टर एलोपैथी की दवा देते हैं, क्योंकि वहां एलोपैथ डॉक्टर या तो उपलब्ध नहीं होते या फिर उनकी फीस ज्यादा होती है।मिक्सोपैथी पर बहस । विवाद का मुद्दा यह है कि क्या एक पैथी में प्रशिक्षित डॉक्टर दूसरी पैथी की चिकित्सा कर सकता है? इसे एलोपैथ ‘मिक्सोपैथी’ कहते हैं। चूंकि स्वास्थ्य राज्य का विषय है, इसलिए इस बारे में तय करने का कानूनी अधिकार राज्यों को ही है। महाराष्ट्र में BAMS डॉक्टरों को एलौपैथी दवाओं के इस्तेमाल की अनुमति के लिए पहले भी कई बार आंदोलन हुए हैं और सरकार ने उनकी मांगें मान ली हैं। शर्त यह थी कि वे एलोपैथिक दवाओं का एक वर्ष का प्रशिक्षण पूरा कर लें और निर्धारित परीक्षा भी उत्तीर्ण करें। इसे Certificate Course in Modern Pharmacology (CCMP) कहा जाता है।
विरोध की वजह । होम्योपैथिक डॉक्टर भी इसी तरह की परमिशन मांग रहे हैं। राज्य सरकार ने इस पर उन्हें मेडिकल काउंसिल में पंजीयन की अनुमति दे दी है। एलोपैथ डॉक्टर इसी का विरोध कर रहे। महाराष्ट्र के अलावा कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात, पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, असम और उत्तराखंड में भी BAMS डॉक्टर एलोपैथिक दवाएं लिख सकते हैं। लेकिन, होम्योपैथ को किसी भी राज्य में ऐसी अनुमति नहीं। फिर भी वे ऐसी दवाएं देते ही हैं। महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि जो हो रहा है उसे कानूनी दायरे में लाने के लिए CCMP की व्यवस्था की गई ताकि गरीब तबके को सस्ते में आधुनिक चिकित्सा उपलब्ध हो।
प्राथमिक उपचार । BAMS डॉक्टर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में प्रयुक्त दवाएं ही लिख सकते हैं, जैसे बुखार, दर्द, एसिडिटी, दस्त और उल्टी, एलर्जी वगैरह की दवा। उन्हें जटिल और जोखिम वाली दवाओं के इस्तेमाल की छूट नहीं है। साफ है कि BAMS डॉक्टरों को बीमारी की आरंभिक स्थिति में इलाज की ही अनुमति है। होम्योपैथिक डॉक्टर भी इसी की मांग कर रहे हैं। आगे चलकर यूनानी और अन्य पारंपरिक चिकित्सा करने वाले डॉक्टर भी ऐसी ही मांग कर सकते हैं।
दोनों के तर्क । राज्य सरकार का तर्क हैं कि डॉक्टरों की कमी के कारण ‘मिक्सोपैथी’ का स्वीकार करना जरूरी है, जबकि एलोपैथ डॉक्टरों का कहना है कि एलोपैथी की चिकित्सा केवल MBBS/MD जैसे प्रशिक्षित डॉक्टरों को ही करनी चाहिए, क्योंकि मरीजों की सुरक्षा इससे जुड़ी हुई है। ये दोनों तर्क आज की हालत में बहुत गले नहीं उतरते।
डॉक्टरों की स्थिति । देश में प्रति 1000 आबादी पर औसतन एक एलोपैथिक डॉक्टर है, जबकि महाराष्ट्र में यही अनुपात 600 पर एक का है। वहीं BAMS डॉक्टरों का देश में अनुपात 3500 की जनसंख्या पर एक है, जबकि राज्य में 1210 पर एक। होम्यापैथिक डॉक्टरों की बात करें तो उनका देशव्यापी अनुपात 4150 पर एक है और राज्य में 1420 लोगों पर एक। ये आंकड़े बताते हैं कि देश के औसत की तुलना में महाराष्ट्र बेहतर स्थिति में है।
असल समस्या । हालांकि डॉक्टरों का बड़ा तबका शहरों और महानगरों में केंद्रित है। दिक्कत ग्रामीण भारत की है, जहां लगभग 65% आबादी रहती है, लेकिन उनके लिए एलोपैथिक और अन्य डॉक्टर मात्र 34% उपलब्ध हैं। इनमें भी एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या कम ही होती है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों की हालत खस्ता है और बड़े अस्पताल दूर होते हैं। कहीं एलोपैथिक डॉक्टर मिल भी गया, तो फीस ज्यादा होती है। ऐसे में आयुष डॉक्टर ही काम आते हैं।
सिस्टम सुधरे । इस विवाद को एलोपैथी बनाम होम्योपैथी नहीं समझना चाहिए। मुख्य मुद्दा यह है कि ग्रामीण इलाकों में और गरीब तबकों तक सामान्य बीमारी की चिकित्सा सुविधाएं किस तरह पहुंचाई जाए। इस विवाद में आयुष डॉक्टरों के आधुनिक दवाओं में गहन प्रशिक्षण की आवश्यकता उभर कर सामने आती है। शिक्षा पाठ्यक्रमों में समुचित बदलाव कर या नई ट्रेनिंग सुविधा पैदा कर इससे पार पाया जा सकता है।