कवच नहीं बन सकता पद और कद

Contributed byRanvijay.Singh1|नवभारतटाइम्स.कॉम
in bsp position and stature are not paramount organizational discipline is supreme mayawatis strict stance
n NBT रिपोर्ट, लखनऊ : उत्तर प्रदेश में मिशन 2027 की तैयारियों में जुटी बसपा अब संगठन में निष्क्रियता, संदिग्ध गतिविधियों और अनुशासनहीनता को लेकर किसी तरह की नरमी के मूड में नहीं दिख रही है। पार्टी के हालिया फैसलों से संकेत साफ है कि नेता का पद और राजनीतिक कद चाहे जितना बड़ा हो, अगर संगठन की लाइन से बाहर गया तो कार्रवाई तय है। खास बात यह है कि कार्रवाई की जद में ऐसे चेहरे भी आए हैं, जिनकी पार्टी के शीर्ष नेताओं से नजदीकी रही है।

बसपा ने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। अंटू मिश्रा मायावती सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके हैं और लंबे समय तक राष्ट्रीय महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के करीबी सहयोगी माने जाते रहे। यानी संगठन में उनका राजनीतिक कद साधारण नहीं था। इसके बावजूद पार्टी ने कार्रवाई में कोई रियायत नहीं दिखाई।
करीबी होने का भी नहीं मिला ‘सहारा’: इससे पहले दो अगस्त को बसपा ने कई राज्यों के प्रभारी सिद्धार्थ गौतम को भी पार्टी से बाहर कर दिया था। सिद्धार्थ राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद के ससुर हैं। ऐसे में लगातार दो फैसलों को पार्टी के भीतर संदेश साफ है कि संगठन का अनुशासन रिश्तों और पद से ऊपर है और किसी के भी करीबी होने से अनुशासनहीनता पर सुरक्षा का कवच नहीं मिल सकता। बसपा सूत्रों की मानें तो चुनाव से पहले बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को निष्क्रिय नेताओं से बाहर निकालकर जमीन पर सक्रिय करना है।

‘साथ नहीं तो सगठन में नहीं’ : बसपा से पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अंटू मिश्रा की रवानगी को लेकर तमाम तरह के सवाल भी उठ रहे हैं। सूत्रों की मानें तो साल 2020 में अंटू मिश्रा के बीजेपी में जॉइनिंग की अटकलें लगने लगी थीं, हालांकि जॉइनिंग नहीं हुई। इसके बाद से ही बसपा के संगठन से जुड़े आयोजनों में उनकी मौजूदगी कम होती गई। पिछले 10 वर्षों के दरम्यान पार्टी में उनकी सक्रियता कभी खुलकर सामने नहीं आई। बड़े आयोजनों तक में उनकी मौजूदगी काफी सीमित बनी हुई थी।

ब्राह्मण वोट पर नजर, फिर ब्राह्मण चेहरे पर ऐक्शन : बसपा मिशन 2027 के तहत अपने पुराने दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण को धार देने की कोशिश कर रही है। साल 2007 में यही सोशल इंजिनियरिंग बसपा को पूर्ण बहुमत की सरकार तक ले गई थी। अब बदले राजनीतिक माहौल में मायावती सर्वसमाज के साथ ब्राह्मणों के बीच भी पार्टी की पैठ बढ़ाने पर जोर दे रही हैं। बसपा सूत्रों की मानें तो अंटू मिश्रा का निष्कासन करके पार्टी ने संगठनात्मक अनुशासन को किसी भी चेहरे से ऊपर रखने का संदेश दिया है। इसके साथ ही ब्राह्मण समाज के बीच पार्टी का चेहरा कौन होगा? यह भूमिका अब नए नेताओं और नए सामाजिक संपर्क अभियानों के जरिए तय की जा सकती है।