हिंद महासागर में बदल रही लड़ाई की तस्वीर

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चीन की नौसैनिक ताकत अब सिर्फ नए जहाजों और विमानों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। वह उन्हें चलाने के लिए बड़ी संख्या में प्रशिक्षित पायलट भी तैयार कर रहा है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) पहले कुछ अनुभवी पायलटों पर निर्भर थी, जिन्हें विमानवाहक पोतों के संचालन के लिए तैयार किया जाता था। अब उसने पायलटों की भर्ती और प्रशिक्षण की एक स्थायी व्यवस्था बनाई है। मकसद बड़े पैमाने पर कैरियर पायलट तैयार करना है।

दोहरा सिस्टम । चीन की नौसेना ने पायलट तैयार करने के लिए दो रास्ते अपनाए हैं। पहले से अनुभवी नौसैनिक पायलटों को विमानवाहक पोत से उड़ान भरने की ट्रेनिंग दी जाती थी। चीन 2019 से कैरियर एविएशन के लिए युवाओं की सीधी भर्ती भी कर रहा है। चीनी अधिकारी इसे डबल ट्रैक सिस्टम कहते हैं, जिसमें अनुभव के साथ युवा जोश भी शामिल है।
सीधी भर्ती । अब चीन ने भर्ती का दायरा भी बढ़ा दिया है। इसमें हाईस्कूल पास युवा, नौसेना के एविएशन स्कूलों के छात्र, साइंस और इंजीनियरिंग से जुड़े ग्रैजुएट और दूसरे सैन्य व सिविल उम्मीदवार शामिल हैं। उसने महिला कैरियर पायलटों की ट्रेनिंग भी शुरू की है। साफ है, चीन के विमानवाहक पोतों की संख्या और उनकी क्षमता, दोनों बढ़ रही है। हर विमान के लिए सिर्फ एक पायलट काफी नहीं होता। पायलटों को ट्रेनिंग, आराम और ड्यूटी में बदलाव की जरूरत होती है। ऑपरेशन के लिए रिजर्व पायलट भी जरूरी हैं। इसके अलावा अलग-अलग तरह के विमानों के लिए अलग विशेषज्ञ चाहिए।

अनुभव बेशकीमती । चीन के लिए जहाज और विमान बनाना, अनुभवी कैरियर पायलट तैयार करने से आसान है। सिर्फ ज्यादा पायलट होना काफी नहीं है, अनुभव भी जरूरी है। इसलिए बेड़े के साथ ट्रेनिंग की सुविधाएं भी बढ़ानी होंगी। सिम्युलेटर, ट्रेनिंग विमान, जमीन पर अभ्यास की सुविधाएं और विमानवाहक पोतों पर प्रशिक्षण के पर्याप्त मौके जरूरी होंगे। चीन की भर्ती मुहिम के पीछे एक बड़ी आबादी से जुड़ी चुनौती भी है। कामकाजी उम्र के युवाओं की संख्या घट रही है। वहीं सेना को अच्छे तकनीकी और वैज्ञानिक युवाओं के लिए सिविल एविएशन व टेक्नॉलजी कंपनियों से भी मुकाबला करना पड़ रहा है।

भविष्य का अंदाजा । भारत के लिए चीन का यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि इससे उसकी नौसैनिक ताकत की भविष्य की दिशा का पता चलता है। पेइचिंग के नए विमानवाहक पोतों की चर्चा अक्सर उनके आकार, विमानों की संख्या और हथियारों के आधार पर होती है। लेकिन, ज्यादा महत्वपूर्ण बात उसका ऐसी व्यवस्था बनाना है, जो लंबे समय तक कैरियर ऑपरेशन को जारी रख सके। पायलटों की लगातार भर्ती और ट्रेनिंग से साफ है कि चीन विमानवाहक पोतों को अपनी समुद्री ताकत का स्थायी हिस्सा बनाना चाहता है।

संख्या अहम नहीं । इसका असर हिंद महासागर पर भी पड़ेगा। चीन के विमानवाहक पोत अगर पश्चिमी प्रशांत से आगे जाकर काम करते हैं, तो सिर्फ जहाज होना काफी नहीं होगा। इसके लिए प्रशिक्षित पायलट, तकनीकी कर्मचारी, कमांडर और मजबूत लॉजिस्टिक व्यवस्था भी चाहिए होगी। भर्ती और ट्रेनिंग पर चीन का बढ़ता जोर दिखाता है कि वह लंबे समय तक दूर समुद्री इलाकों में अपनी ताकत बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। इसलिए भारत को चीनी चुनौती सिर्फ जहाजों की संख्या से नहीं आंकनी चाहिए।

कमियां दूर हों । हमें इस मामले में अपने मानव संसाधन पर ध्यान देना होगा। भारतीय नौसेना के पास विमानवाहक पोतों का लंबा अनुभव है, लेकिन इस बढ़त पर हमेशा निर्भर नहीं रहा जा सकता। नौसेना को पर्याप्त संख्या में पायलट, प्रशिक्षक और तकनीकी कर्मचारियों की जरूरत होगी। इसके लिए ट्रेनिंग की बेहतर व्यवस्था और ज्यादा उड़ानों का अभ्यास जरूरी है। भारत की बड़ी कमी यह भी है कि उसके पास विमानवाहक पोतों के लिए अपना विशेष ट्रेनिंग विमान नहीं है। साथ ही, कैरियर पर इस्तेमाल होने वाले लड़ाकू विमानों की संख्या और उनकी तैयारी की स्थिति में भी सुधार की जरूरत है।

सीखने वाली बात । चीन के अनुभव से यह सीखा जा सकता है कि जहाज जल्दी खरीदे जा सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रभावी ढंग से चलाने की क्षमता बनाने में समय लगता है। पेइचिंग ने इसके लिए तैयारी शुरू कर दी है। उसका विमानवाहक पोत कार्यक्रम अब एक नए दौर में पहुंच रहा है। इसमें भारत के लिए सबक साफ है - हिंद महासागर में असली बढ़त उस देश को मिलेगी, जिसके पास बेहतर पायलट, ट्रेनिंग, तकनीकी कर्मचारी और युद्ध का ज्यादा अनुभव होगा। भारत को भी अपनी क्षमता बढ़ानी होगी। अपने लंबे अनुभव को मजबूत और स्थायी सैन्य बढ़त में बदलना होगा।

(लेखक इंग्लैंड के किंग्स कॉलेज में प्रफेसर हैं)