हम भी अगर बच्चे होते

नवभारतटाइम्स.कॉम
gen alphas unique protest children to protest at jantar mantar for laddoos
Gen Z अभी पूरी तरह घरों में लौटी भी नहीं थी कि उनके छोटे भाई-बहन बाहर आने लगे हैं। Gen Alpha की गतिविधियों में अचानक आई तेजी से बुर्जुआ और बुजुर्ग वर्ग, दोनों हैरान-परेशान हैं। Gen Z इतनी बड़ी थी कि धरना-प्रदर्शन के लिए घर से निकल गई। Gen Alpha का अंदाज अलग है। ये माता-पिता की गोद से ही आंदोलन कर रहे हैं।

15 अगस्त के बीच एक विडियो वायरल हुआ, जिसमें स्कूल के मंच पर एक छोटा बच्चा माइक लेकर भाषण दे रहा था। उसका कहना था कि देश में इतना कुछ बदल गया, लेकिन स्कूलों का दो लड्डू देने वाला रिवाज वही है। महंगाई की तरह हर साल एक-एक लड्डू बढ़ाते तो आज हर बच्चा 80 लड्डू लेकर घर जाता। नहीं तो ये लड्डू लवर जंतर-मंतर जाएंगे और आंदोलन पढ़ाई पर नहीं, मिठाई पर होगा।
मुझे लगता है आगे चलकर बच्चों के आंदोलन का स्वरूप और आधुनिक होगा। बेटा पापा से गेमिंग फोन मांगेगा। पापा मना करेंगे। बेटा कैमरा निकालकर बोलेगा, 'दोस्तों, आज हम भारतीय पिता की तानाशाही के खिलाफ आंदोलन शुरू कर रहे हैं।' पांच मिनट बाद पापा फोन दिलाकर कहेंगे, 'बेटा, विडियो डिलीट कर देना।' इंजीनियर साहब ने इसे भी विकास की नई संभावना बताया है। उनका कहना है कि अब शिकायत निवारण पोर्टल बंद कर हर सरकारी दफ्तर के बाहर बोर्ड लगा देना चाहिए, 'पहले वायरल करें, फिर आवेदन दें।' स्वतंत्रता दिवस पर इंजीनियर साहब खुद गुनगुना रहे थे, 'हम भी अगर बच्चे होते, नाम हमारा होता बबलू-डबलू, खाने को मिलते लड्डू और दुनिया कहती…।' आगे की पंक्ति वह नहीं बता पाए। शायद अगला आंदोलन लड्डू की संख्या तय करेगा।