सुख-दुख, अंधेरा-उजाला दिखाते हैं जीने की राह

Contributed byनिर्मल जैन|नवभारतटाइम्स.कॉम
happiness sadness darkness light paradoxes teach the way of living life
मनुष्य का जीवन सुख-दुख और तरह-तरह की परिस्थितियों से मिलकर बना है। जीवन कभी दूध में पानी की तरह घुला-मिला दिखाई देता है, तो अगले ही क्षण पानी में तेल की तरह अलग। कभी धुंधला, जटिल और अस्त-व्यस्त लगता है, तो कभी इतना पारदर्शी और सरल कि सब कुछ सुलझा हुआ प्रतीत होता है। कई बार जीवन रुई के ढेर में सुई खोजने जितना कठिन और दोधारी तलवार पर नंगे पांव चलने जैसा चुनौतीपूर्ण हो जाता है, कभी गुलाब के फूलों के बिछौने जैसा सुखद।

वास्तव में, इन विरोधाभासों के बीच संतुलन ही हमें जीना सिखाता है। जब हम भौतिक सफलता, धन, प्रसिद्धि और सामाजिक मान्यता जैसी बाहरी उपलब्धियों को ही जीवन का लक्ष्य मान लेते हैं, तब असली उद्देश्य पीछे छूट जाता है। यही उपेक्षा तनाव, असंतोष और खालीपन बनकर हमारे सामने आ खड़ी होती है। सुख-दुख, प्रसन्नता-अप्रसन्नता, जन्म-मृत्यु और लाभ-हानि से जीवन की शृंखला बनती है। इन्हीं से प्रेम, शांति, वीरता, हास्य, क्रोध, भय और घृणा जैसे भाव जन्म लेते हैं। इन भावनाओं को मिटाना संभव नहीं, लेकिन उन्हें समझ कर संयमित करना अवश्य संभव है। स्वामी कुंदकुंदाचार्य ने कहा है, ‘राग और द्वेष के प्राकृतिक दोषों से प्रेरित होकर इंद्रियां घोड़ों की तरह गलत रास्ते पर ले जाती हैं, इसलिए धर्म से मन रूपी लगाम को कसना पड़ता है।’
जब यह समन्वय स्थापित होता है, तो दृष्टिकोण बदल जाता है। मन में समभाव पैदा होता है। निराशा, शंका और अविश्वास कमजोर पड़ने लगते हैं। अपने-पराए, मान-अपमान, अच्छाई-बुराई और सुख-दुख के द्वंद्व हमें विचलित नहीं करते। हम परिस्थितियों के साथ बहने के बजाय अपने भीतर स्थिर रहना सीखते हैं। विज्ञान ने शरीर की अनेक व्याधियों की औषधि खोज ली है, लेकिन मन के विकारों की कोई ऐसी औषधि अब तक नहीं मिली। उनका वास्तविक उपचार आत्मचिंतन, विवेक और अंतरात्मा के साथ तालमेल बनाने में है।