ये लाठी, वो लाठी

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ideology of the lathi delhi vs ranchi the double standard of power
लाठी तो वही थी, लेकिन चलाने वाले हाथ अलग थे। लाठी खाने वाले वही थे, लेकिन लाठीचार्ज की जगह अलग थी। पुलिस की दनादन चलीं लाठियां और Gen Z की चीख-पुकार सैकड़ों किमी की दूरी के बावजूद एक जैसी ही थी। कमोबेश एक जैसे ही कारुणिक दृश्य थे, लेकिन आश्चर्य कि देखने वालों की नजरें एकदम अलग थीं। यूं तो सत्ता की हनक एक जैसी ही होती है, लेकिन यहां दो तरह की दिखाई दे रही थी। जिन्हें दिल्ली के आंदोलनकारियों की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी, उनके कान झारखंड के प्रदर्शनकारियों के लिए बंद हो चुके थे। जो झारखंड के स्टूडेंट्स के साथ खड़े थे, वे दिल्ली की तरफ आंखें मूंदे दिखाई दे रहे थे। कुल मिलाकर माजरा नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक मार्केज के जादुई यथार्थवाद जैसा था, यानी सत्ता के खेल समूची संवेदनशीलता को सोखे जा रहे थे।

जंतर-मंतर पर लाठियां चलीं, तो उसे लोकतंत्र पर प्रहार कहा गया। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अंतिम संस्कार कहा गया! रांची में लाठियां चलीं, तो शब्दावली बदल गई। वहां लाठीचार्ज को अराजकता पर प्रहार माना गया। तो यही वह क्षण था, जब पता चला कि लाठी की भी अपनी विचारधारा होती है। इसीलिए तो बताया गया कि जंतर-मंतर की लाठी राजनीतिक थी और रांची की लाठी प्रशासनिक। एक जैसी घटना के लिए दो अलग शब्दकोश सामने आ गए।
लेकिन, मैंने देखा कि लाठीचार्ज के बाद सबसे ज्यादा पश्चाताप लाठी को ही हुआ। हमेशा ही होता है ऐसा। दरअसल उसको आखिरी समय तक पता नहीं होता कि वह किसका सिर फोड़ रही है और क्यों फोड़ रही है? किसके हाथ-पांव तोड़ रही है और क्यों तोड़ रही है? उसे बस इतना ही मालूम होता है कि ऊपर से आदेश मिला है और नीचे के नागरिकों पर पिल पड़ना है।