चीन संग रिश्तों पर सोचे भारत

नवभारतटाइम्स.कॉम
india china relations changing global landscape and the need to rethink indias foreign policy
भारत की विदेश नीति को लेकर असहजता बढ़ रही है। लेकिन, बहस अब भी बड़े सवालों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है। सदी की शुरुआत में भारत के फैसलों के पीछे तीन बुनियादी बातें थीं।

तीन बातें । पहली, सन 2000 तक अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन चुका था। उसका साथ भारत के लिए जरूरी माना गया। दूसरी बात, चीन को साझा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी कहा गया। इससे दोनों देशों के बीच दशकों से चली आ रही असहमति और अविश्वास को कम करने में मदद मिली। दोनों मुल्कों के बीच इस नई समझ का आधार भारतीय महत्वाकांक्षा और अमेरिका के आर्थिक हित थे। तब उम्मीद थी कि भारत एशिया में पश्चिमी देशों के लिए अहम रणनीतिक साझेदार बनेगा।
अमेरिकी लक्ष्य । तीसरी जरूरी बात थी कि 2000 के दशक की शुरुआत में वैश्विक अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही थी और अमेरिका ग्लोबल साउथ को G-7 से जोड़ने में आगे था। आपसी निर्भरता के जरिये अमेरिका की इच्छा ऐसा वैश्विक आर्थिक ढांचा बनाने की थी, जिसमें इनोवेशन, सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर उसका दबदबा रहे। हालिया बरसों में भारत-अमेरिका साझेदारी की तीनों धारणाएं कमजोर हुई हैं।

कमजोर अमेरिका । अमेरिका ने न केवल अपनी वैश्विक अहमियत खोई है, बड़ी भू-राजनीतिक घटनाओं को संभालने की उसकी क्षमता भी घटी है। गिरती ताकत को थामने के लिए उसने चीन के साथ व्यापारिक टकराव, रूस के साथ NATO संघर्ष और ईरान के खिलाफ कार्रवाई तक की। हालांकि, इन प्रयासों ने उसकी कमजोरियां ही उजागर कीं। इतिहास में शक्ति संतुलन अक्सर बड़े युद्धों के बाद बदलता रहा है। मौजूदा दौर भी इससे अछूता नहीं है। यूक्रेन और ईरान में हुए संघर्षों ने NATO के हथियार भंडार पर दबाव बढ़ाया है और पश्चिमी सैन्य शक्ति की सीमाएं भी बताईं।

चीन मजबूत । चीन अब भारत से इतना आगे निकल चुका है कि दो दशक पहले की बातें अव्यावहारिक लगती हैं। उसकी बढ़त केवल अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं है। वह नीति संस्थानों, मानव संसाधन और तकनीक में भी मजबूत है। सबसे बड़ा बदलाव वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र का पूरब की ओर खिसकना है। मैन्युफैक्चरिंग, हाई टेक्नॉलजी, नैचुरल रिसोर्स, कंज्यूमर डिमांड और फाइनैंशल कैपिटल में यूरेशिया बड़ा आर्थिक केंद्र बन गया है।

विदेश नीति की चुनौती । दुनिया की बदलती परिस्थितियों ने हमारी विदेश नीति को चुनौती दी है, लेकिन नीति-निर्माता इसके लिए तैयार नहीं दिखते। अमेरिका की नीतियां भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और क्षेत्रीय प्रभाव को सीमित कर रही हैं, फिर भी नीति-निर्माताओं का जोर चीन को भारतीय रणनीति का मुख्य आधार बनाए रखने पर है। 2005 में अमेरिका ने भारत को 21वीं सदी की बड़ी ताकत बनाने में मदद का वादा किया था। 2026 तक स्थिति बदल गई है। अमेरिकी अधिकारियों के बयानों में भारत के बढ़ते प्रभाव को लेकर आशंकाएं दिखी हैं।

तैयारी जरूरी । क्या भारत को अपने आसपास की उथल-पुथल और बदलते शक्ति संतुलन के बीच सख्त रुख अपनाना चाहिए? चीन के साथ व्यावहारिक संबंध भारत की विदेश नीति की प्राथमिकता होनी चाहिए और इसका उद्देश्य केवल हिमालय में तनाव कम करना नहीं, बल्कि पश्चिम पर अत्यधिक निर्भरता को घटाना भी रहे। भारत को प्रॉक्सी भूमिका से निकलकर अपनी क्षेत्रीय ताकत की पहचान को दोबारा स्थापित करना होगा। चीन के साथ साझा जिम्मेदारियों को जगह देनी होगी। दुनिया तेजी से बहुध्रुवीय हो रही है। ऐसे में स्थिरता बनाए रखने में जिम्मेदार यूरेशियाई शक्तियों की भूमिका अहम होगी। भारत को इसके लिए तैयार होना होगा।

भविष्य पर ध्यान । भारत की विदेश नीति की बहस भी अब पुराने ढर्रे तक सीमित नहीं रह सकती। अब भारत को अपनी विदेश नीति के लिए नया बौद्धिक ढांचा बनाना होगा। इसमें संप्रभुता, क्षेत्रीय परस्पर निर्भरता, व्यापार और निवेश के नए जियो-इकॉनमिक नेटवर्क, अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक हित और वैश्विक व्यवस्था बनाने की क्षमता को प्राथमिकता देनी होगी। रणनीति बदलने के लिए भारतीय नेतृत्व को अतीत के बजाय भविष्य पर ध्यान देना होगा।

(लेखक ने ‘पावरशिफ्ट : इंडिया चाइना रिलेशंस इन ए मल्टीपोलर वर्ल्ड’ किताब लिखी है)