Nirmal Purjas Death On Mountain Avalanche Claims 18 Guinness World Record Holder Mountaineer
पहाड़ जीतने के नशे ने निर्मल को छीन लिया
नवभारतटाइम्स.कॉम•
निम्स दाई यानी निर्मल पुर्जा आधुनिक पर्वतारोहण के सबसे दिलेर और दुस्साहसी पर्वतारोहियों में गिने जाते थे। 43 साल की उम्र में 18 गिनीज वर्ल्ड रेकॉर्ड बनाने वाले पुर्जा 30 जुलाई को एवलांच का शिकार हो गए। हिमालय की चोटियों पर हिमस्खलन होता ही है और पर्वतारोही पहले भी उसकी चपेट में आए हैं। लेकिन, पाकिस्तान में काराकोरम रेंज की ब्रॉड पीक पर 30 जुलाई को आए एवलांच ने दुनिया से 10 बेहद आला दर्जे के पर्वतारोही छीन लिए। निर्मल पुर्जा अपने हैटट्रिक प्रॉजेक्ट पर थे, दुनिया की 8,000 मीटर ऊंची सभी 14 चोटियों को तीन बार फतह करने का मिशन। इसमें से दो अभियान वह बिना सप्लिमेंटल ऑक्सीजन के करना चाहते थे। दो बार वह चोटियों को फतह करने और सबसे कम समय (छह महीने छह दिन) में पीक करने का गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड बना भी चुके थे।
कठिन मिशन । निर्मल को नशा था पहाड़ फतह करने का, नए रेकॉर्ड बनाने का, लेकिन यह मिशन अलग था। ब्रॉड पीक दुनिया की 12वीं सबसे ऊंची चोटी है- 8,051 मीटर। स्थानीय बाल्ती भाषा में इसे फल्चन कांगड़ी कहा जाता है यानी चौड़ा पर्वत। इसी से अंग्रेजी में ब्रॉड पीक नाम पड़ा। दरअसल, इसकी चोटी की धार तकरीबन डेढ़ किमी चौड़ी है, यानी इसके टॉप पर कोई अलग-सा दिखने वाला शिखर नहीं। आठ हजार मीटर से ज्यादा ऊंचाई वाली चोटियों में ब्रॉड पीक की चढ़ाई सबसे मुश्किल और टेक्निकल मानी जाती है। हादसे की वजह । इस इलाके में 22 जुलाई के आसपास भारी बर्फबारी होने लगी थी। बहुत मुमकिन है कि ताजा गिरी बर्फ जमी न हो, जो एवलांच के रूप में नीचे आ गई। टनों बर्फ के नीचे से जिंदा बच निकलना चमत्कार से कम नहीं होता, जो नहीं हुआ। निर्मल के साथ जिन दूसरे पर्वतारोहियों ने जान गंवाई, वे भी कम नहीं थे। ग्रुप में केवल नेपाल के ही पांच जाने-माने पर्वतारोही थे। निर्मल पुर्जा ने नेपाली शेरपाओं को उनका सम्मान और सुविधाएं दिलाने के लिए बहुत काम किया। वह पोर्टर और सपोर्ट स्टाफ की हिम्मत व ताकत को हमेशा सलाम करते रहे। नेपाल के खुंबु इलाके में एवरेस्ट बेस कैंप के रास्ते में लोबुशे का पोर्टर हाउस उनके इसी सम्मान का प्रतीक है।
प्रकृति को चुनौती । यह घटना सवाल भी खड़े करती है। क्या इस तरह पहाड़ों को फतह करने का मिशन सही है, क्योंकि यह पागलपन कहीं थमता नहीं। निम्स दाई ने जो रिकॉर्ड छह महीने में बनाया, उसे बाद में किसी ने 90 दिन का कर दिया। कम वक्त का मतलब है ज्यादा हेलीकॉप्टर और ज्यादा संसाधनों का इस्तेमाल। इस होड़ में तब प्रकृति के साथ चलने, उसे महसूस करने और संकट में कदम पीछे खींचने के बजाय दीवानगी हावी रहती है जीत की। निर्मल की किताब 'Beyond Possible' में इसकी झलक मिलती है।