हम सुविधा देखते हैं, लेकिन कॉकरोच देखता है प्रकृति

Contributed byअनमोल सक्सेना|नवभारतटाइम्स.कॉम

कॉकरोच को एक नए नजरिए से देखा जा रहा है। यह बताता है कि हर जीव में अच्छे और बुरे दोनों गुण होते हैं। कॉकरोच हमारे मन की भावनाओं को दिखाता है। सिक्स सिग्मा दृष्टि से कॉकरोच में छह अच्छे गुण हैं। वहीं छह नकारात्मक पहलू भी हैं।

cockroach mirror of nature or reflection of human perceptions

हाल के दिनों में कॉकरोच चर्चा का विषय बना हुआ है। लेकिन, मैंने इसे बाबूजी डॉ. श्याम लाल सक्सेना के सिक्स सिग्मा–सिक्स कोप्पा के नजरिए से देखने का प्रयास किया। यह बताता है कि हर जीव, वस्तु और परिस्थिति में सकारात्मक व नकारात्मक - दोनों प्रवृत्तियां मौजूद होती हैं।

यदि ब्रह्म प्रत्येक जीव में व्याप्त है, तो कॉकरोच भी उसी दिव्य सत्ता का अंश है, क्योंकि उसमें भी जीवात्मा है। वह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति में सुंदर और कुरूप, प्रिय और अप्रिय जैसे भेद हमारी मानवीय धारणाएं हैं। आध्यात्मिक परिपक्वता इन सीमाओं से परे देखता है। बौद्ध दृष्टिकोण से कॉकरोच भी संसार-चक्र में एक संवेदनशील प्राणी है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह हमारे मन का दर्पण बन जाता है, क्योंकि उसे देखते ही भय, घृणा या असहजता पैदा होती है। बौद्ध धर्म हमें कीट से अधिक अपनी प्रतिक्रियाओं को देखने की शिक्षा देता है। कबीर शायद इस विरोधाभास पर मुस्कराते। वह ईश्वर को मंदिरों में खोजने और साधारण जीवन में उसकी उपेक्षा करने की प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाते और कहते -

कॉकरोच कहे पुकार के, लो पंडित मुल्ला जान। सबसे मैली चीज है, बढ़ा हुआ अभिमान।

सिक्स सिग्मा दृष्टि से कॉकरोच में छह गुण दिखाई देते हैं - लचीलापन, सजगता, संसाधनों का उपयोग, निरंतरता, अनुकूलन क्षमता और अपनी प्रकृति के प्रति निष्ठा। वहीं इसके छह कोप्पा हैं - केवल जीवित रहने की प्रवृत्ति, सत्य से बचना, अवसरवाद, परिवर्तन का विरोध, प्रतिक्रियात्मक जीवन और चेतना का अभाव। कॉकरोच की सबसे बड़ी आध्यात्मिक शिक्षा यही है कि गुण चेतना से जुड़े रहें। अन्यथा दृढ़ता जड़ता बन जाती है। कॉकरोच अपनी प्रकृति के अनुरूप जीता है, लेकिन बिना आत्म-जागरूकता के।

मनुष्य के पास चेतना है, पर वह अक्सर अपनी वास्तविक प्रकृति से दूर हो जाता है। आध्यात्मिक विकास शायद इसी में है कि हम चेतना और स्वभाव के बीच संतुलन स्थापित कर सकें। तब प्रश्न यह नहीं रह जाता कि कॉकरोच क्या है, बल्कि यह कि वह हमारे भीतर किस सत्य का प्रतिबिंब दिखा रहा है।