7 जून का संपादकीय ‘ न्यायपालिका में AI ’ उस पहलू को सामने लाता है, जिस पर अक्सर तकनीकी उत्साह के बीच पर्याप्त चर्चा नहीं होती। AI निस्संदेह न्याय, प्रशासन, शिक्षा और शोध जैसे क्षेत्रों में कार्यक्षमता बढ़ा सकता है, लेकिन उसे निर्णयकर्ता नहीं, सहायक ही बने रहना चाहिए। न्यायपालिका जैसे संवेदनशील क्षेत्र में मानवीय विवेक , संवेदना और नैतिक जिम्मेदारी का कोई विकल्प नहीं हो सकता। मुख्य न्यायाधीश की यह चिंता उचित है कि तकनीक की गति के अनुरूप कानून और नियमन भी विकसित हों। तकनीक तभी मानवता की सच्ची सहयोगी बनेगी, जब उस पर नियंत्रण, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
प्रियंका श्रीवास्तव, ईमेल से





