मंदिर मार्ग के वाल्मीकि मंदिर में गांधीजी के कमरे में लगी एक पुरानी तस्वीर में उनके साथ पामेला माउंटबेटन दिखाई देती हैं। वह गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में नियमित रूप से जाती थीं। 15 अगस्त, 1947 की ऐतिहासिक रात को वह वायसराय हाउस में मौजूद थीं, जब उनके पिता लॉर्ड लुई माउंटबेटन ने जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। भारत से उनके गहरे लगाव के कारण उन्होंने अपनी बेटी का नाम ‘इंडिया’ रखा था। इस साल 5 जून को 97 वर्ष की आयु में ऑक्सफोर्डशायर में उनका निधन हो गया।
शरणार्थियों की मदद । लॉर्ड माउंटबेटन मार्च 1947 में जब भारत के वायसराय बने, तब पामेला 17 बरस की थीं। उन्होंने अपनी किताबों में उस दौर के भारत को दर्शाया है। बताया है कि कैसे आजादी की खुशी के साथ विभाजन की त्रासदी भी मिली और लाखों शरणार्थी दिल्ली सहित देश के अन्य हिस्सों में पहुंच रहे थे। उन कठिन हालात में पामेला अपनी मां एडविना माउंटबेटन के साथ राहत कार्यों में जुट गईं। वह शरणार्थियों की मदद, घायलों की मरहम-पट्टी करतीं, दवाएं बांटतीं और पुनर्वास कार्यों में भाग लेतीं। इन अनुभवों से उन्होंने भारत की पीड़ा, विविधता और मानवता को करीब से समझा।
सबसे बड़ी सीख । भारत में पामेला माउंटबेटन के सबसे यादगार अनुभवों में महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से मुलाकातें शामिल हैं। एक बार जब गांधीजी वायसराय हाउस में चाय पीने पहुंचे, तब उन्होंने पामेला का कंधा थामा। उस तस्वीर पर काफी विवाद भी हुआ। पामेला ने गांधीजी के साथ ध्यान भी किया और उनकी इस सीख को अपनाया कि सभी धर्म एक ही पेड़ की अलग-अलग शाखाओं जैसे हैं। पामेला माउंटबेटन जीवन भर सभी धर्मों का सम्मान करती रहीं।
भावुक स्मृति । पामेला बिड़ला हाउस में होने वाली गांधीजी की प्रार्थना सभाओं में नियमित रूप से जाती थीं, लेकिन 30 जनवरी 1948 को गांधीजी की हत्या वाले दिन वह नहीं पहुंच सकीं। अगले दिन राजघाट पर अंतिम संस्कार के दौरान वह मौजूद थीं। उन्होंने हजारों शोकाकुल लोगों की भीड़ और रोती-बिलखती महिलाओं को देखा। उनके सामने गांधीजी के पुत्र रामदास ने अपने पिता को मुखाग्नि दी। यह दृश्य उनके जीवन की सबसे भावुक स्मृतियों में से एक रहा।
किताबों में यादें । पामेला ने अपनी किताबों ‘India Remembered’ और ‘Daughter of Empire’ में भारत की स्वतंत्रता और विभाजन काल की यादों को दर्ज किया है। ये किताबें डायरियों, पत्रों और निजी अनुभवों पर आधारित हैं। पामेला माउंटबेटन की विरासत भारतीय इतिहास की उन दुर्लभ कड़ियों में से एक है, जो व्यक्तिगत स्मृतियों के माध्यम से जीवंत बनी रहती है। उनकी किताबें इतिहासकारों, पत्रकारों और पाठकों के लिए हमेशा मूल्यवान स्रोत बनी रहेंगी। भारत से लौटने के बाद भी वह समाज सेवा से जुड़ी रहीं।




