बिस्मिल की पीड़ा

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महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल ने व्यक्तिगत दुश्मनी के बाद बदला लेने की सोची। यह सोच उनके स्वास्थ्य पर भारी पड़ी। मां के कहने पर उन्होंने बदला न लेने का संकल्प लिया। इससे उनके मन को शांति मिली और बीमारी दूर हो गई। बिस्मिल ने जाना कि क्षमा और त्याग में अद्भुत शक्ति है।

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महान क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल का जीवन साहस और देशभक्ति के साथ ही आत्मसंयम व उच्च चरित्र के प्रेरक प्रसंगों से भी भरा है। एक बार कुछ लोगों ने व्यक्तिगत दुश्मनी से उनकी हत्या का प्रयास किया। सौभाग्य से वह बच गए, लेकिन इस घटना ने उनके मन में बदले की भावना जगा दी। वह बार-बार उन लोगों को सबक सिखाने की योजना बनाते, पर हर बार कोई न कोई बाधा आ जाती। समय बीतता गया, लेकिन बदला न ले पाने की कसक उनके भीतर गहराती गई। धीरे-धीरे यही मानसिक तनाव उनके स्वास्थ्य पर भारी पड़ने लगा। वह बीमार रहने लगे। मां ने भांप लिया, पीड़ा का वास्तविक कारण कुछ और है। जब उन्होंने प्यार से पूछा, तो बिस्मिल ने मन का सारा दर्द कह सुनाया। मां ने गंभीर स्वर में कहा, ‘मुझे एक वचन दो, उन लोगों से कभी बदला नहीं लोगे।’ बिस्मिल दुविधा में पड़ गए, लेकिन उन्होंने मां के सामने बदला न लेने का संकल्प ले लिया। अब उनका मन शांत होने लगा। प्रतिशोध की आग बुझी तो बीमारी भी दूर हो गई। बिस्मिल ने अनुभव किया कि क्षमा और त्याग में गजब की शक्ति है।