मौसमी नारा

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गर्मी बढ़ रही है और मौसम बदल रहा है। एक नेता को प्रधानमंत्री बनने का गुमान था। वोटरों ने उन्हें पटक दिया है। अब वह उसी पार्टी के नेता के गले लग रहे हैं जिसे वह विदेशी कहते थे। मां, माटी, मानुष का नारा इसी दिन के लिए था।

seasonal slogan the changing meaning of maa mati manush and political maneuvers

'मौसम बहुत गर्म हो गया है भाई साब। पर्यावरण की रक्षा पर अब पहले से ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।' श्रीमान क ने सुबह-सुबह मिलते ही ज्ञान वर्षा शुरू कर दी। मैंने टुकड़ा जोड़ा, 'मां, माटी, मानुष की याद दिला दी आपने। इसमें पेड़-पौधों वाले पर्यावरण के साथ अपने वातावरण की रक्षा का मामला भी झलकता है। भविष्य को ध्यान में रखकर ही यह नारा बनाया गया था।'

मेरे इस स्क्वेयर कट से चौंकने की बारी श्रीमान क की थी। बल्ले को चूम कर दूर जाती गेंद को जिस तरह भौचक्का होकर गेंदबाज देखता है, कुछ वैसा ही भाव उनके चेहरे पर उभरा। मैंने कहा, 'प्रशांत महासागर वाले अल-निनो का असर मॉनसूनी बारिश पर दिखने जा रहा है, दूसरे पॉलिटिकल अल-निनो का असर सियासी मैदान में दिखने जा रहा है। मौसम तेजी से बदल रहा है। इसकी आंधी में तंबू उखड़ने लगे हैं।'

श्रीमान क ने अब हथियार डाल दिए। उनने बिल्कुल गुड लेंथ बॉलिंग करते हुए कहा, 'गर्मी बढ़ रही है। पानी भाप बन रहा है। पर आपकी बात समझ में नहीं आ रही भाई साब। थोड़ा विस्तार से बताएं तो पकड़ में आए।'

मेरे पास अब स्ट्रेट ड्राइव का मौका था। 'मामला ऐसा है कि एक नेता को गुमान हो गया कि प्रधानमंत्री बनने लायक तो वही हैं। सब समझाते रहे कि दूसरों की पार्टियां ज्यादा बड़ी हैं, पर ऐसी सलाहें सुनकर वह भड़क जाया करती थीं। अगली पार्टी की नेता विदेशी है, उससे तो बात ही नहीं करनी है। ऐसे बयान देने लगती थीं।'

श्रीमान क ने पूछा, 'लेकिन भाई साब, नारे की क्या तुक बनी इसमें?' तफसील से समझाने के लिए मैंने उन्हें पार्क की बेंच पर टिका दिया। 'ऐसा है, नेताजी को वोटरों ने इस तरह माटी में पटका है कि अब एकदम मानुष रूप दिखने लगा है। जिसे विदेशी कहा, अब उसी के गले पड़ने को आतुर हैं। उसी में मां नजर आने लगी है। बताइए, मां-माटी-मानुष का नारा इसी दिन के लिए तो नहीं बनाया था?'