मुंबई वाले तो जानते हैं, लेकिन बाहर वालों को शायद ही पता हो कि यहां एक ऐसी नदी बहती है, जिसका नाम 'मीठी' है। रहा होगा कभी इसका पानी मीठा यानी पीने लायक, लेकिन अब तो यह गंदे नाले में तब्दील हो चुकी है। तो यही मीठी नदी चीख-चीख कर कह रही है- कुछ नहीं कर सकते, तो कम से कम नाम ही बदल दो मेरा। इतने शहरों, रास्तों, इमारतों, पुलों, स्टेशनों के नाम बदल गए। फिर मेरा नाम बदलने में क्या दिक्कत है? नहीं लगता है कि तुम लोग कभी मेरे पानी को पीने लायक बना सकोगे। करोड़ों रुपये खर्च कर चुके हो अब तक, लेकिन मैं तो वैसी की वैसी ही हूं। पॉलिथीन की थैलियों से पटी हुई। गाद से भरी हुई...।
मीठी नदी विलाप कर रही है, लेकिन फिर भी कोई उसे महत्व नहीं दे रहा है। क्या लोग उसके प्रचंड क्रोध को भूल चुके हैं? इक्कीस साल पहले मीठी नदी ने बता दिया था कि गुहार न सुनने पर वह बड़ा गुनाह भी कर सकती है। हजारों की जिंदगी लील सकती है। अरबों की संपत्ति नष्ट कर सकती है। इस महानगर का नक्शा बिगाड़ सकती है। 2005 की उस भयावह बाढ़ के बाद सरकार ने मनुहार की थी- 'मीठी नदी, छोड़ दो सारी कड़वाहट। नाम के अनुरूप हम तुमको फिर से मीठा बनाएंगे।' मीठी नदी को लगा था कि इतने गुस्से के बाद तो सरकार उसे किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं करेगी, लेकिन ढीठता की हद है कि वह अपना किया वादा भूल गई। मीठी नदी को मीठा बनाने का काम तो चला, लेकिन सिर्फ कागज़ों पर। गाद निकाली गई, सिर्फ कागजों पर। मशीनें चलीं, सिर्फ कागजों पर। परिणामस्वरूप फर्जी बिलों की बाढ़ आ गई। 65.5 करोड़ रुपयों का गाद निकासी स्कैम हो गया और फिर सामने आ गई 7000 पेज की चार्जशीट!
बहुत हैरान है मीठी नदी। जितनी हैरान है, उतनी ही परेशान। क्या उसके नसीब में यही दिन देखना बचा था? इससे तो अच्छा यह होता कि वह भी सरस्वती नदी की तरह धरती में लुप्त हो जाती। बस, मुंबई के किस्सों-कहानियों में ही बची रहती। मीठी नदी सोच रही है। सोच रही है और अपने आंसू पोंछ रही है।

