Boat Club To Burari The Changing History Of Protest Sites In Delhi
बोट क्लब से बुराड़ी तक विरोध की आवाज़
नवभारतटाइम्स.कॉम•
जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। अब बुराड़ी मैदान , रामलीला मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड में धरना-प्रदर्शन होंगे। बात बुराड़ी मैदान से शुरू करें, तो यह दिल्ली के नक्शे पर महज एक जगह नहीं। कोरोनेशन पार्क के आसपास का इलाका अपने भीतर इतिहास की कई परतें समेटे हुए है।
दिल्ली दरबार । 12 दिसंबर 1911 को ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज पंचम के दिल्ली दरबार का आयोजन इसी इलाके में हुआ था। तभी ब्रिटिश सरकार ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की थी। शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री काल में कोरोनेशन पार्क के एक हिस्से को अलग करके विकसित किया गया।किसान आंदोलन । एक समय बड़े धरना-प्रदर्शन इंडिया गेट के पास बोट क्लब के लॉन में हुआ करते थे। संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और केंद्र सरकार के अहम दफ्तरों के करीब होने के कारण यह जगह आंदोलनकारियों के लिए खास थी। बोट क्लब के इतिहास में अक्टूबर 1988 का किसान आंदोलन मील का पत्थर साबित हुआ। तब किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसान दिल्ली पहुंचे थे।
बदलनी पड़ी जगह । राजधानी के बीचोबीच इतनी बड़ी भीड़ जमा होने से यातायात और सामान्य जनजीवन पर असर पड़ा। इस आंदोलन ने सरकार को किसानों की ताकत का अहसास कराया, लेकिन प्रशासन के सामने भीड़ और व्यवस्था संभालने की चुनौती भी खड़ी कर दी। इसके बाद बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों को लेकर पाबंदियां सख्त होती गईं। 1993 के आसपास जंतर-मंतर ने प्रदर्शन स्थल के रूप में पहचान बनानी शुरू की।
विरोध-प्रदर्शनों का ठिकाना । 16 दिसंबर 2012 को निर्भया कांड के बाद जंतर-मंतर महिलाओं की सुरक्षा और कठोर कानूनों की मांग का केंद्र बना। 2015-16 में पूर्व सैनिकों ने वन रैंक वन पेंशन की मांग को लेकर यहां लंबा धरना दिया। 2017 में तमिलनाडु के कर्जग्रस्त किसानों ने करीब 40 दिनों तक प्रदर्शन किया। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ प्रदर्शन हुए। 2023 में ओलिंपिक पदक विजेता पहलवान विनेश फोगाट, साक्षी मलिक और बजरंग पूनिया ने भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाते हुए धरना दिया।
याद रहेगी । अब देखना होगा कि बुराड़ी मैदान आम लोगों की आवाज उठाने वालों के लिए कितना सुविधाजनक साबित होता है। यह जगह मध्य दिल्ली से दूर है, तो सवाल रहेगा कि प्रदर्शनकारी किस तरह पहुंचते हैं। दिल्ली में प्रदर्शनों के ठिकाने बदल रहे हैं, लेकिन जंतर-मंतर पर हुए आंदोलनों और वहां नेताओं के ओजस्वी भाषणों की गूंज लंबे समय तक बनी रहेगी। इन जगहों का इतिहास बताता है कि मैदान बदल सकते हैं, लेकिन अपनी बात कहने और सत्ता तक अपनी आवाज पहुंचाने की जरूरत कभी खत्म नहीं होती।