जोड़-तोड़ का सहारा

नवभारतटाइम्स.कॉम•
stock market decline and political maneuvering common mans concerns
सुबह-सुबह पार्क में मिले श्रीमान क चुप-चुप से लगे। दुआ-सलाम का भी पहले जैसे जोश से जवाब नहीं दिया। अभी तो हवा भी ऐसी खराब नहीं हुई है कि मास्क लगाने की प्रैक्टिस की जाए। वैसे भी स्मॉग से निपटने के लिए पिछले साल की फाइलों को नए रंग-रोगन में पेश किया जाने लगा है। अदालतों में पिटीशन दाखिल करने वाले पिछले जवाब की नए सिरे से नुक्ताचीनी में जुट गए हैं।

पर यह तो सालाना त्योहार ठहरा। अपने श्रीमान क क्यों दुखी होने लगे? वह जैसे पूछे जाने के ही इंतजार में थे। ' शेयर बाजार का हाल देख रहे हैं भाई साब! रिटर्न तो क्या जोड़ें, सालभर में 14% डाउन हुआ पड़ा है। महंगाई के चलते बचत वैसे ही हवा हुई जा रही है। कोई करे तो क्या करे?' श्रीमान क ने पूरा दुख उड़ेल दिया। ढांढस बंधाना जरूरी था, 'नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने हैं। डॉनल्ड भाई साब की लुटिया डूब जाए तो उनके तेवर ढीले हो जाएंगे। फिर वेस्ट एशिया में जंग भी रुकी ही समझो। ऐसा हुआ नहीं कि कच्चे तेल की गर्मी निकल जाएगी। फिर महंगाई औंधे मुंह गिरेगी। रुपया मजबूत होने लगेगा। AI के लिए दीवानगी भी ठंडी पड़ती दिख रही है। इधर अपनी इकॉनमी फर्राटा भर रही है। मॉनसून का टंटा संभालने लायक अनाज पड़ा ही है। तो समझिए कि चिंता खत्म ही होने वाली है।'
लेकिन श्रीमान क मुतमईन होते न दिखे, 'यह तो ईट पर ईंट बैठाने की बात हो गई, जिस पर कई नेता दांव लगा रहे हैं। प्रोटेस्ट का टेंपरेचर बढ़ाए रखो तो क्या पता सरकारी पालकी उठाए हुए कुछ नेता पाला बदलकर इधर को आ जाएं। यह तो कठबइठी हुई।' मेरा मन कहने को हुआ कि इसी का सहारा है, पर दुखी को और दुखी करने का मन न हुआ।