New Language From Roasting Analysis Of Youth Protest Demonstrations
रोस्टिंग से निकली एक नई भाषा
नवभारतटाइम्स.कॉम•
पहले जंतर-मंतर पर पेपर लीक फिर स्मैश पेट्रियार्की और अब मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर युवाओं के प्रदर्शन ने भाषा को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं, जिन पर बहस जारी है। बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार और नेता इस नई भाषा को लेकर दो खेमों में बंटे हैं। एक खेमे का कहना है कि लोकतंत्र में विरोध, असहमति तो ठीक है, पर भाषा हर हाल में संयत होनी चाहिए। दूसरा पक्ष इस भाषा के साथ है। उसका कहना है कि आंदोलन की भाषा ऐसी ही होती है, खासकर जब आंदोलन युवाओं का हो। यहां हम किसी पक्ष के बजाय इस नई भाषा की पड़ताल करने की कोशिश करेंगे।
भाषा से पहले रोस्ट । Gen Z के प्रोटेस्ट में रोस्टिंग की विधा सबसे ज्यादा उभरी। रोस्टिंग असल में खामियों के आधार पर किसी व्यक्ति का मजाक उड़ाना है, लेकिन इसके लिए उस व्यक्ति की अनुमति ली जाती है। 20वीं सदी में अमेरिका के Friars Club में यह विधा सामने आई। इसके बाद डीन मार्टिन सेलेब्रेटी रोस्ट्स जैसे टीवी कार्यक्रम ने इसे लोकप्रिय बनाया। धीरे-धीरे यह स्टैंडअप कॉमिडी की एक दिलचस्प विधा में बदल गई। ज्यादातर कमीडियन शो में अपना सेट करने से पहले दर्शकों के साथ क्राउड वर्क करते हैं, जिससे माहौल बन सके। क्राउड वर्क में रोस्टिंग महत्वपूर्ण टूल है। हालांकि यहां आधिकारिक तौर पर उस व्यक्ति की स्वीकृति नहीं ली जाती, जिसका मजाक उड़ाया जाता है, पर दर्शक और कमीडियन के बीच एक अघोषित सहमति होती है।लोकतांत्रिक जीवन शैली । क्या सिर्फ वोट डालना लोकतंत्र है? रोजमर्रा की जिंदगी में असहमति को सुनना, उसे आत्मसात करना और अपनी आलोचना को संयत तरीके से बर्दाश्त करना लोकतांत्रिक जीवन शैली का अहम हिस्सा है। व्यंग्य यह काम करता है। अच्छे व्यंग्य के लिए कहा जाता है कि वह कमरे में बैठे आधे लोगों को चुभता है और आधे लोगों को हंसाता है। रोस्ट चूंकि व्यक्तिगत होता है, इसलिए रोस्टिंग में निशाने पर आए व्यक्ति के अलावा सब हंसते हैं। ऐसे में रोस्ट का असर ज्यादा तीखा होता है।
असली हंसी । रोस्ट खुद पर हंसने की क्षमता विकसित करता है। यह लोकतंत्र के लिए बेहद जरूरी है। खुद पर खुलकर हंसने वाला व्यक्ति असहमति को बड़ी आसानी से बर्दाश्त कर सकता है। स्टैंडअप कॉमिडी का सेटअप असल में काफी लोकतांत्रिक होता है। यहां दर्शक कई बार कमीडियन को पलट कर रोस्ट कर देते हैं और कमीडियन इसे अच्छी ऑडियंस की निशानी मानते हुए मुस्कुराते हैं। सोचिए, ऐसा क्या जादू है इस सेटअप में कि लोग महंगे टिकट खरीदकर खुद को रोस्ट करवाने जाते हैं। जवाब है- जिंदगी के तमाम दबावों के बीच दिल से निकली हंसी, जो झूठे अहम को दरकिनार करती है।
कहां बनी यह भाषा । अब सोचिए, गाली-गलौज और उन्मुक्तता से भरी भाषा कहां बन रही थी? Gen Z के मीम्स, रील्स का अध्ययन करने से साफ है कि उन्होंने कोई नई गाली नहीं, बल्कि अपनी पुरानी पीढ़ियों से सीखी चीजों को ही दोहराया। गालियां पहले भी दी जाती थीं, पर घर के मुखिया ही ऐसा करते थे। Gen Z ने इस वर्जना को तोड़ दिया। उन्होंने जो कहा, खुलकर कहा। बिना किसी लिहाज के कहा। लड़कियों ने भी उन गालियों का प्रयोग किया, जिनमें पुरुषों के अंगों के नाम आते थे। सीमित दूरी तक ही सही, गालियों ने जेंडर की दीवार भी लांघी।
अभिव्यक्ति का तरीका । Gen Z की यह भाषा असल में कॉमिडी शोज, ओटीटी और सोशल मीडिया की चैट में विकसित हुई। यहां शुचिता का आग्रह रखने वाले बड़े नहीं थे। Gen Z एक-दूसरे को खूब रोस्ट करते हैं, गाली भी देते हैं, पर कोई बुरा नहीं मानता। लड़कियां भी खुद को बैडी कहने में नहीं हिचकतीं। असल में गालियां उनके लिए बुरी या वर्जित चीज नहीं, बात कहने का सलीका और एक्सप्रेशन हैं।
मीडियम का फेर । एक बात और ध्यान देने वाली है। प्रोटेस्ट के दौरान दो अलग तरह के लोग एक-दूसरे के मुकाबिल खड़े हो गए। वॅट्सऐप, ट्विटर के यूजर बनाम इंस्टाग्राम के यूजर। इंस्टा पर विडियो की अधिकता है। जाहिर है, इसके यूजरों के पास विडियो यानी विजुअल्स वाली भाषा थी, जो टेक्स्ट की तुलना में लोगों के दिमाग पर कम समय में ज्यादा असर डालती है। एकाग्रता का टाइम स्पैन कम होने के कारण Gen Z लंबे टेक्स्ट मेसेज में दिलचस्पी ही नहीं दिखा पाए, जबकि उनके शॉर्ट विडियो सबने देखे। इससे नैरेटिव उनके पक्ष में मुड़ गया। बड़ा सवाल यह है कि तमाम स्लैंग और ऑडियो विजुअल की यह भाषा प्रोटेस्ट के साथ खत्म हो गई? इसका जवाब जानने के लिए किसी रिसर्च की जरूरत नहीं, बस इंस्टा रील या यूट्यूब शॉर्ट्स खोलकर देख लीजिए।