Difficulties Increase For Immigrants In America Need To Create Opportunities At Home For Indian Talent
घर में मौक़े
नवभारतटाइम्स.कॉम•
अमेरिका में काम करने वाले प्रवासियों के लिए जगह तेजी से सिकुड़ती जा रही है। वर्क परमिट से जुड़े नियमों पर सख्ती के बाद मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं। पिछले हफ्ते ही अमेरिका ने आठ बड़ी टेक कंपनियों के PERM कार्यक्रम में नए आवेदन दाखिल करने पर रोक लगाई थी। इस फैसले से इन कंपनियों में काम करने वाले प्रवासियों के लिए ग्रीन कार्ड पाने में और देरी हो सकती है। भारत के लिए चिंता की बात इसलिए है, क्योंकि प्रवासी पेशेवरों में उसके लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है।
बढ़ रही सख्ती । कोई नहीं बता सकता कि ट्रंप प्रशासन का अगला कदम क्या होगा। राहत की उम्मीद तो बिल्कुल भी नहीं लगानी चाहिए, क्योंकि ट्रंप की अगर किसी नीति में निरंतरता देखने को मिली है, तो वह है प्रवासियों के प्रति कठोरता। उनकी नजर में H-1B वीजा समस्याओं की जड़ है, क्योंकि इसी के रास्ते दूसरे देशों के प्रफेशनल अमेरिका में दाखिल होते हैं। एक लाख डॉलर की फीस लगाकर उन्होंने इसे नियंत्रित करने की कोशिश की और जब अदालती रोक लगी तो दूसरे रास्ते से दूसरी फीस लगा दी, और भी ज्यादा।ट्रंप की राजनीति । सच यह है कि 1990 में यह वीजा प्रोग्राम शुरू होने के बाद से सबसे ज्यादा फायदा अमेरिकी कंपनियों को ही हुआ है। और अमेरिकी कॉरपोरेट्स को खड़ा करने में सबसे अधिक मेहनत प्रवासी भारतीयों ने की है। हालांकि ट्रंप और उनके अफसर इन तथ्यों को खातिर में लाएंगे, इस पर शक है। आखिर उनकी अपनी मजबूरी भी है, अपने MAGA समर्थकों को खुश करना है। ऐसे में सवाल है कि भारत के पास क्या रास्ता बचता है।
कूटनीतिक रास्ता । अमेरिका को आगे बढ़ाने में योगदान देने वाले भारतीय अगर आज खुद बीच रास्ते पर खड़े हैं, तो भारत को बात करनी चाहिए। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अगले हफ्ते भारत आएंगे। उनके साथ बातचीत में यह मुद्दा सबसे ऊपर होना चाहिए। लेकिन, इस बात को भी मान लेना चाहिए कि अमेरिका में प्रवासियों की स्थिति बदल चुकी है, भले वे कहीं से भी आते हों। तो भारत को देखना होगा कि कैसे वह अपनी प्रतिभाओं के लिए घर में ही अवसर पैदा कर सकता है।
निवेश और रोजगार । देश में रोजगार की संख्या के साथ उनकी गुणवत्ता पर भी ध्यान देना होगा। AI, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में अधिक से अधिक निवेश चाहिए। रिसर्च एंड डिवेलपमेंट पर ज्यादा फोकस करना होगा। टॉप इंस्टीट्यूट्स और इंडस्ट्री के बीच सहयोग बढ़ाया जाए। जब देश में ही बेहतर मौके मिलेंगे, तो युवाओं के लिए विदेश जाना मजबूरी नहीं, अपनी पसंद का फैसला होगा।