सच्चा पद

नवभारतटाइम्स.कॉम•
saint ravidass teachings true status comes from actions and thoughts not birth or wealth
15वीं शताब्दी की बात है। संत रविदास अपनी कुटिया में बैठकर जूते बना रहे थे। उनके हाथ अपने काम में व्यस्त थे और मन ईश्वर की भक्ति में लीन। वह मानते थे कि मनुष्य की महानता उसके जन्म या धन से नहीं, उसके कर्म और विचारों से होती है। धीरे-धीरे उनकी भक्ति और ज्ञान की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। उनकी वाणी में ऐसा प्रभाव था कि सुनने वाले के मन में समानता और प्रेम का भाव जाग उठता। चित्तौड़ की रानी झाली तक भी संत रविदास की ख्याति पहुंची। वह उनसे मिलने गईं। रानी झाली ने कहा, 'महाराज, मैं जीवन का सच्चा मार्ग समझना चाहती हूं।' संत रविदास ने उत्तर दिया, 'मनुष्य की पहचान उसके ऊंचे कुल या धन से नहीं होती। जिसका मन निर्मल है और जिसके हृदय में दूसरों के लिए प्रेम है, वही सच्चे अर्थों में महान है।' रानी को समझ आ गया कि सच्चे ज्ञान के सामने पद और प्रतिष्ठा का अहंकार टिक नहीं सकता। रानी झाली और संत रविदास की इस भेंट का उल्लेख अनंतदास की 'रैदास परचई' में मिलता है।

रेकमेंडेड खबरें