अरुण जेटली: चुनावी राजनीति में हार, पर सियासत की बुलंदियों तक पहुंचे
अरुण जेटली: चुनावी राजनीति में हार, पर सियासत की बुलंदियों तक पहुंचे
NewsPoint•
पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली का जीवन राजनीति के उस अनोखे पहलू को दिखाता है जहाँ वे शिखर तक तो पहुँचे, पर चुनावी मैदान में कभी जीत हासिल नहीं कर पाए। चार दशक से ज़्यादा के राजनीतिक सफर में उन्होंने कभी लोकसभा का चुनाव नहीं जीता, फिर भी वाजपेयी और मोदी सरकारों में वित्त, कानून और रक्षा जैसे बड़े मंत्रालय संभाले। GST लागू करना और रेल बजट को आम बजट में मिलाना जैसे ऐतिहासिक फैसले उनके कार्यकाल में हुए। जेटली की राजनीति राज्यसभा के ज़रिए 2000 से 2018 तक चलती रही। 2014 में उन्होंने अमृतसर से लोकसभा का चुनाव नवजोत सिंह सिद्धू की जगह लड़ा, लेकिन अमरिंदर सिंह से हार गए। यह उनके जीवन का एकमात्र लोकसभा चुनाव था।
दिल्ली में 28 दिसंबर 1952 को जन्मे अरुण जेटली ने छात्र जीवन में ही जीत के साथ राजनीति में कदम रखा था। 1970 के दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव जीतकर उन्होंने राजनीति की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। एक छात्र नेता के तौर पर उन्होंने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी का कड़ा विरोध करके अपनी नेतृत्व क्षमता का लोहा मनवाया। 25 जून 1975 की रात, जब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने आई, तो जेटली अपने घर के पिछले दरवाज़े से निकलकर एक दोस्त के यहाँ छिप गए। अगली सुबह उन्होंने एबीवीपी के सैकड़ों छात्रों के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर के ऑफिस के सामने प्रदर्शन किया और इंदिरा गांधी का पुतला फूंका। इस दौरान उन्हें गिरफ्तार कर तिहाड़ जेल भेजा गया, जहाँ वे 19 महीने तक रहे। तिहाड़ जेल में उन्हें उसी सेल में रखा गया जहाँ अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज नेता भी कैद थे।तिहाड़ जेल से निकलने के बाद अरुण जेटली ने वकालत शुरू की। 1989 में वीपी सिंह सरकार ने उन्हें एडिशनल सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया। इस पद पर रहते हुए उन्हें बोफोर्स जैसे अहम केस की ज़िम्मेदारी मिली, जिस घोटाले की वजह से राजीव गांधी 1989 के चुनाव हार गए थे। धीरे-धीरे जेटली का राजनीतिक कद बढ़ता गया। 1980 में वे भाजपा में शामिल हुए और 1991 में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। एक प्रवक्ता के तौर पर उन्होंने अपनी बातों से पार्टी की विचारधारा को आगे बढ़ाया और विरोधियों को चुप करा दिया।
जेटली के राजनीतिक करियर को सबसे बड़ी उड़ान 1999 में मिली, जब वे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में राज्य मंत्री बने। बाद में उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 1999 से वाजपेयी सरकार में उन्होंने कानून और न्याय, शिपिंग, सूचना और प्रसारण, और वाणिज्य और उद्योग जैसे कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले। वाजपेयी सरकार के जाने के बाद भी जेटली संसद में पार्टी की एक मज़बूत आवाज़ बने रहे। 2009 में उन्हें राज्यसभा में विपक्ष का नेता भी बनाया गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की रणनीति बनाने में भी जेटली की अहम भूमिका थी।
मोदी सरकार के शुरुआती पांच सालों में अरुण जेटली ने कई बड़ी ज़िम्मेदारियाँ निभाईं। उन्होंने अलग-अलग समय पर वित्त मंत्रालय, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और सूचना व प्रसारण मंत्रालय का कार्यभार संभाला। कई बार तो वे एक साथ कई मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी भी संभालते थे। एक समय ऐसा भी आया जब अरुण जेटली भारत के रक्षा, वित्त और कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री थे।
अरुण जेटली का जन्म दिल्ली में हुआ था। छात्र जीवन में वे काफी तेज़-तर्रार नेता थे। आपातकाल के दौरान उनकी गिरफ्तारी और जेल जाना उनके राजनीतिक जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुआ। जेल से निकलने के बाद उन्होंने वकालत के साथ-साथ राजनीति में भी अपनी पकड़ मज़बूत की। 1989 में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बनकर उन्होंने बोफोर्स जैसे बड़े मामले संभाले। यह उनके लिए एक बड़ी ज़िम्मेदारी थी।
भाजपा में शामिल होने के बाद जेटली ने पार्टी के लिए एक मज़बूत आवाज़ के तौर पर काम किया। प्रवक्ता के तौर पर वे अपनी बातों से सबको प्रभावित करते थे। 1999 में वाजपेयी सरकार में मंत्री बनने के बाद उनका कद और बढ़ गया। उन्होंने कई महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाले, जिससे देश की नीतियों को आकार देने में उनकी भूमिका अहम हो गई।
2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तो अरुण जेटली को वित्त मंत्रालय की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मंत्रालय था, खासकर तब जब देश की अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने की ज़रूरत थी। जेटली ने इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया। उन्होंने देश की कर व्यवस्था को बदलने में अहम भूमिका निभाई। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) को लागू करना उनके सबसे बड़े कामों में से एक था। GST लागू होने से देश में एक समान कर व्यवस्था बनी, जिसने व्यापार को आसान बनाया।
इसके अलावा, जेटली ने रेल बजट को आम बजट में मिलाने का ऐतिहासिक फैसला भी लिया। इससे पहले रेल बजट अलग से पेश होता था, लेकिन इस विलय से रेलवे के लिए फंड की योजना बनाना और उसे लागू करना ज़्यादा आसान हो गया। इन फैसलों से देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा मिली।
जेटली ने रक्षा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी भी संभाली। यह एक ऐसा मंत्रालय है जहाँ देश की सुरक्षा से जुड़े अहम फैसले लिए जाते हैं। उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को भी पूरी निष्ठा से निभाया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय का कार्यभार संभालते हुए उन्होंने मीडिया और सूचना के क्षेत्र में भी काम किया।
अरुण जेटली की सबसे खास बात यह थी कि वे एक साथ कई मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी संभाल सकते थे। वे एक ऐसे नेता थे जिन पर पार्टी और सरकार दोनों को भरोसा था। उनकी ईमानदारी और साफ छवि ने लोगों के दिलों में जगह बनाई थी। वे एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने चुनावी राजनीति से दूर रहते हुए भी देश की सेवा की।
2014 में अमृतसर से लोकसभा चुनाव लड़ना उनके राजनीतिक जीवन का एक अनोखा अध्याय था। वे क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू की जगह चुनाव लड़े थे। यह उनका एकमात्र लोकसभा चुनाव था, जिसमें उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन इस हार के बावजूद, राज्यसभा सदस्य के तौर पर उन्होंने देश की सेवा जारी रखी।
अरुण जेटली का निधन 24 अगस्त 2019 को बीमारी के कारण हुआ। वे 66 साल के थे। उनके निधन से देश ने एक अनुभवी और मज़बूत नेता खो दिया। उनकी विरासत आज भी देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति में महसूस की जाती है। उन्होंने अपने काम से एक ऐसी छाप छोड़ी है जो हमेशा याद रखी जाएगी।
उनकी छात्र राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक का सफर प्रेरणादायक है। आपातकाल के दौरान उनका विरोध और जेल जाना, यह दिखाता है कि वे सिद्धांतों के पक्के नेता थे। वकालत से राजनीति में आकर उन्होंने अपनी बुद्धिमत्ता और तर्कों से सबको प्रभावित किया। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने पार्टी को मज़बूत बनाने में अहम भूमिका निभाई।
वाजपेयी सरकार में मंत्री बनने के बाद उन्होंने देश के विकास में योगदान दिया। मोदी सरकार में वित्त मंत्री के तौर पर उनके फैसलों ने देश की अर्थव्यवस्था को नई राह दिखाई। GST और रेल बजट का विलय जैसे फैसले उनके दूरदर्शी सोच का प्रमाण हैं।
अरुण जेटली एक ऐसे नेता थे जिन्होंने कभी चुनावी राजनीति की बिसात पर पैर नहीं रखा, लेकिन अपनी काबिलियत और मेहनत से देश के सबसे बड़े पदों पर पहुंचे। उनकी ईमानदारी और साफ छवि ने उन्हें हमेशा लोगों के दिलों में ज़िंदा रखा है। वे एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने देश के लिए बहुत कुछ किया और हमेशा याद रखे जाएंगे।