भारत जल विमर्श 2047: जल संरक्षण पर अहमदाबाद में मंथन, 'ग्रीन मैन' ने दी तीसरे विश्व युद्ध की चेतावनी
भारत जल विमर्श 2047: जल संरक्षण पर अहमदाबाद में मंथन, 'ग्रीन मैन' ने दी तीसरे विश्व युद्ध की चेतावनी
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नई दिल्ली, 24 अगस्त (आईएएनएस)। गुजरात के अहमदाबाद में 'भारत जल विमर्श 2047' नाम से दो दिवसीय एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसमें देश भर से जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले कई प्रमुख लोग शामिल हुए। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य पानी की अहमियत को समझना और उसके संरक्षण के तरीकों पर विचार-विमर्श करना था। 'ग्रीन मैन ऑफ इंडिया' के नाम से मशहूर विजय पाल बघेल ने इस मौके पर कहा कि पानी और हवा को बनाया नहीं जा सकता, इन्हें सिर्फ बचाया जा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भविष्य में कभी तीसरा विश्व युद्ध हुआ, तो वह पानी को लेकर ही होगा। वहीं, पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविदों ने 'जल है तो कल है' का नारा देते हुए पानी बचाने और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने पर खास जोर दिया।
'ग्रीन मैन ऑफ इंडिया' विजय पाल बघेल ने अपने संबोधन में कहा, "मैं विजयपाल बघेल, 'पेड़ लगाओ पेड़ बचाओ' के नारे के साथ पर्यावरण के लिए काम करता हूं। मुझे 'ग्रीन मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाना जाता है। गुजरात की पवित्र धरती पर 'उद्यम' और 'सेंटर फॉर वाटर पीस' नाम की दो संस्थाओं ने मिलकर 'वाटर डिसकोस' नाम से यह दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया है। इस कार्यक्रम का सबसे अहम मुद्दा पानी पर गहराई से सोचना है, क्योंकि पानी को बनाया नहीं जा सकता।" उन्होंने आगे समझाया कि 'जलवायु' शब्द असल में 'जल' और 'वायु' इन दो शब्दों से मिलकर बना है।बघेल ने इस बात पर जोर दिया कि न तो पानी को बनाया जा सकता है और न ही हवा को। इन्हें केवल बचाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इसी जागरूकता को फैलाने के लिए इस कार्यक्रम में पानी के क्षेत्र में काम करने वाले सभी महत्वपूर्ण लोगों को आमंत्रित किया गया है। उन्होंने याद दिलाया कि जब तक पानी जमीन की सतह पर उपलब्ध था, तब तक पानी की कोई कमी महसूस नहीं होती थी। लेकिन जब से हमने 'बटन कल्चर' यानी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल शुरू किया है, तब से हमने धरती मां की कोख को खाली कर दिया है, उसे सुखा दिया है।
उन्होंने आगे कहा कि यही कारण है कि आज हम ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अगर भविष्य में कभी तीसरा विश्व युद्ध छिड़ता है, तो वह निश्चित रूप से पानी के लिए ही होगा। पानी जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है। पानी और पेड़ एक दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। जहां पानी होगा, वहां पेड़ होंगे, और जहां पेड़ होंगे, वहां पानी भी उपलब्ध होगा। लेकिन पेड़ों की संख्या लगातार कम हो रही है, जिसका सीधा मतलब है कि हमारी सांसें भी कम हो रही हैं। उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान के अनुभव को याद करते हुए कहा कि जब इंसानों को घरों में बंद कर दिया गया था, तब प्रकृति अपने असली रूप में लौट आई थी। चारों तरफ हरियाली छा गई थी।
बघेल ने आगे कहा कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान हमने देखा कि ऑक्सीजन की कमी के कारण हमने अपने कई प्रियजनों को खो दिया। लेकिन उसी दौरान नदियों का पानी भी निर्मल और अविरल हो गया था। इस कार्यक्रम के माध्यम से पूरी दुनिया को यह संदेश जाएगा कि पानी कितना महत्वपूर्ण है। हमें पानी की हर एक बूंद को बचाना होगा। इससे भी ज्यादा जरूरी है कि हमें अपनी सांसों को बचाना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमें सांस लेने के लिए हवा कहां से मिलेगी।
पद्मश्री से सम्मानित सेठ पाल सिंह ने बताया कि वह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से हैं। उन्होंने डॉ. मोर जोशी का धन्यवाद किया, जिन्होंने गुजरात के अहमदाबाद में 'भारत जल विमर्श 2047' के तहत पानी पर यह कार्यशाला आयोजित की है। उन्होंने अपना मुख्य संदेश देते हुए कहा कि हमें यह सोचना होगा कि हम किस तरह से पानी को बचा सकते हैं। उनका कहना था, "जल है तो कल है, जल है तो जीवन है।" उन्होंने भारत की विविधता का जिक्र करते हुए कहा कि हमारा देश नदियों का देश है। अगर नदियां नहीं रहेंगी, पानी नहीं बचेगा, तो जीवन और यह पूरी सृष्टि, सब कुछ इसी पर निर्भर है।
उन्होंने एक मार्मिक सवाल उठाया, "अंबर से जब पानी बरसे, बूंद-बूंद को क्यों हम तरसे?" उन्होंने समझाया कि अमृत जैसा पानी जब बारिश के रूप में बरसता है, तो वह हमारे खेतों, सड़कों और गलियों से बहकर नालियों और नदियों के माध्यम से हमारी उपजाऊ जमीन को काटकर ले जाता है। हमें इस पानी को बचाना होगा। उन्होंने सुझाव दिया कि खेतों की मेढ़ों को मजबूत करके और छोटे-छोटे बांध बनाकर इस पानी को रोका जा सकता है। उन्होंने इस पहल को बहुत अच्छा बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के आह्वान का भी जिक्र किया और कहा कि उसी क्रम में पानी के मामले में हमारी स्थिति कैसी होगी, इसके लिए यह एक बहुत अच्छा चिंतन और मंथन है।
2019 में पद्मश्री से सम्मानित भरत भूषण त्यागी ने बताया कि वह बुलंदशहर जिले के बीटा गांव के रहने वाले हैं। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में पानी की नीति और कार्य योजना पर विस्तार से चर्चा होगी। इस कार्यक्रम में पूरे देश से जल संरक्षण के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञ इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने कहा कि पानी इस समय चर्चा का सबसे अहम विषय है। जब हम प्रकृति के संरक्षण, उसके वैभव और व्यवस्था को देखते हैं, तो मिट्टी-पत्थर से लेकर सभी वनस्पतियां, सभी जीव-जंतु और मनुष्य के लिए पानी बहुत उपयोगी है। यदि पानी की उपयोगिता को हम नहीं समझेंगे, तो बार-बार संरक्षण के सवाल उठते रहेंगे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस समय सबसे ज्यादा जरूरत मानसिकता को बदलने की है। हमें प्रकृति के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। हमें संसाधनों को समझना होगा और उनकी व्यवस्था को जानना होगा।
वकील महेश गोयल ने बताया कि वह पिछले 18 सालों से जल संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्होंने एक किताब भी लिखी है, जिसकी अब तक 80,000 प्रतियां छप चुकी हैं और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हो चुका है। उनकी किताब में पानी की कमी के कारणों पर प्रकाश डाला गया है। उन्होंने लोगों से केवल दो संकल्प लेने का आग्रह किया। पहला, पानी बर्बाद नहीं करेंगे। इसके लिए हमें बस इतना ध्यान रखना है कि नल खराब न हों और बेवजह न चलें। दूसरा, वर्षा जल का संग्रहण करना है।
इस कार्यक्रम में 'ग्रीन मैन ऑफ इंडिया' विजय पाल बघेल ने पानी और हवा को अनमोल बताते हुए कहा कि इन्हें बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ बचाया जा सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य में पानी को लेकर ही तीसरा विश्व युद्ध हो सकता है। उन्होंने कहा, "जब तक पानी भू-पृष्ठ जल हुआ करता था, तब तक पानी की कोई किल्लत नहीं थी। जब से हमने बटन कल्चर का प्रयोग किया है, हमने धरती मां की कोख खाली कर दी है, सुखा दिया है।" उन्होंने यह भी कहा कि कोरोना महामारी के दौरान हमने देखा कि ऑक्सीजन की कमी से हमने बहुत लोगों को खोया, लेकिन उसी समय नदियां निर्मल हुईं।
पद्मश्री से सम्मानित सेठ पाल सिंह ने 'जल है तो कल है' का संदेश देते हुए कहा, "अंबर से जब पानी बरसे, बूंद-बूंद को क्यों हम तरसे?" उन्होंने खेतों की मेढ़ों को मजबूत करने और छोटे बांध बनाने जैसे तरीकों से पानी बचाने का सुझाव दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य का भी जिक्र किया।
पद्मश्री से सम्मानित भरत भूषण त्यागी ने कहा कि इस कार्यक्रम में जल की नीति और कार्य योजना पर विस्तृत चर्चा होगी। उन्होंने कहा कि इस समय मानसिकता को बदलने की जरूरत है। हमें प्रकृति के विरोध में नहीं, बल्कि उसके साथ मिलकर आगे बढ़ना होगा। वकील महेश गोयल ने पानी बर्बाद न करने और वर्षा जल संग्रहित करने के दो मुख्य संकल्पों पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि उनकी लिखी किताब की 80,000 प्रतियां बिक चुकी हैं।
यह कार्यक्रम 'भारत जल विमर्श 2047' पानी के संरक्षण और उसके महत्व को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ, जिसने देश भर के जल संरक्षकों को एक मंच पर लाकर भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्रेरित किया।