AIMIM की 2027 यूपी चुनाव तैयारी: गठबंधन या अकेले 200-250 सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति

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लखनऊ, 24 अगस्त: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है और सभी पार्टियां अपनी कमर कस चुकी हैं। इसी बीच, आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) भी प्रदेश में अपनी पैठ जमाने की पूरी कोशिश में है। पार्टी की पहली प्राथमिकता एक मजबूत गठबंधन बनाना है, लेकिन अगर सीटों के बंटवारे पर बात नहीं बनी तो एआईएमआईएम अकेले ही करीब 200 से 250 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। पार्टी की नजर उन विधानसभा क्षेत्रों पर है जहां मुस्लिम मतदाता नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी खुद पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर तराई क्षेत्र के बहराइच तक का दौरा कर चुके हैं और पार्टी ने प्रयागराज, बहराइच, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर और अमरोहा जैसे इलाकों में अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। पार्टी का लक्ष्य बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करना है ताकि चुनाव से पहले अपना सियासी आधार पक्का किया जा सके।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ओवैसी उत्तर प्रदेश के चुनावी महत्व को अच्छी तरह समझते हैं। यही वजह है कि वे उन सीटों पर खास ध्यान दे रहे हैं जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या निर्णायक साबित हो सकती है। पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर अवध और पूर्वांचल के कई हिस्सों में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति बनाई है। एआईएमआईएम सेंट्रल जोन के अध्यक्ष शेख ताहिर सिद्दीकी ने कहा है कि पार्टी 2027 के विधानसभा चुनाव में अपना खाता खोलने के लक्ष्य के साथ पूरी तैयारी कर रही है। उन्होंने कहा, "हम भाजपा को रोकने के लिए सभी विपक्षी दलों के साथ सम्मानजनक हिस्सेदारी वाले गठबंधन के पक्ष में हैं। बसपा के साथ गठबंधन की संभावना हो या चंद्रशेखर आजाद और अन्य दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का विकल्प, हमारा उद्देश्य भाजपा को रोकना है।" सिद्दीकी ने यह भी बताया कि अगर सितंबर तक गठबंधन को लेकर तस्वीर साफ नहीं हुई तो एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश की 200 से 250 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी करेगी। पार्टी की बूथ स्तर तक तैयारियां चल रही हैं और पूरे प्रदेश से लगातार चुनाव लड़ने के लिए आवेदन मिल रहे हैं।
एआईएमआईएम को 2023 के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली सफलता से एक नया राजनीतिक आधार मिला है। पार्टी के कई प्रत्याशियों ने इन चुनावों में जीत दर्ज कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। अब एआईएमआईएम इसी स्थानीय चुनावी सफलता को विधानसभा चुनाव तक ले जाने की कोशिश कर रही है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत के अनुसार, पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर अवध और पूर्वांचल के कई हिस्सों में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका चुनावी नतीजों के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। यदि एआईएमआईएम इन क्षेत्रों में अपना जनाधार बढ़ाने में सफल रहती है, तो इसका असर केवल उसके वोट प्रतिशत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि समाजवादी पार्टी के चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है। हालांकि, पिछले विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम का प्रदर्शन खास नहीं रहा है और पार्टी अब तक विधानसभा में अपना खाता नहीं खोल पाई है।

गठबंधन को लेकर अभी तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, इसलिए एआईएमआईएम ने अपने सभी विकल्प खुले रखे हैं। यदि किसी दल के साथ गठबंधन नहीं हो पाता है, तो पार्टी अपने दम पर करीब 200 से 250 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकती है। पार्टी की कोशिश है कि चुनाव से पहले ऐसे इलाकों में अपना सियासी आधार मजबूत किया जाए जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हुज्जत रजा का मानना है कि यदि ओवैसी की एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन से बाहर रहकर चुनाव लड़ती है, तो इसका मुख्य असर विपक्षी मतों के बंटवारे के रूप में सामने आ सकता है। इससे सीधे तौर पर भाजपा को फायदा मिलने की संभावना रहेगी। वहीं, अगर सपा-कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन एआईएमआईएम को अपने साथ लेता है, तो चुनावी तस्वीर बदल सकती है और विपक्ष को इसका लाभ मिल सकता है। रजा ने यह भी कहा कि चंद्रशेखर आजाद और पल्लवी पटेल जैसे नेताओं और दलों के साथ संभावित तालमेल को 'भीम-मीम' समीकरण के नजरिए से भी देखा जा रहा है। हालांकि, अतीक अहमद के परिवार से जुड़े किसी चेहरे को चुनाव मैदान में उतारने की संभावना पर अभी कोई ठोस निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।

एआईएमआईएम ने फिलहाल प्रयागराज, बहराइच, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर और अमरोहा की कई विधानसभा सीटों पर अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। इन क्षेत्रों में संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। पार्टी का मुख्य लक्ष्य उन इलाकों में अपना सियासी आधार मजबूत करना है जहां मुस्लिम मतदाताओं की संख्या चुनावी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि एआईएमआईएम उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन कितनी मजबूत कर पाती है और 2027 के विधानसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन कैसा रहता है। पार्टी की रणनीति, गठबंधन की संभावनाएं और मुस्लिम मतदाताओं का रुख आने वाले समय में प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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