आरबीआई की ब्याज दर बढ़ोतरी पर एसबीआई की रिपोर्ट: महंगाई और वैश्विक जोखिमों का प्रभाव
आरबीआई की ब्याज दर बढ़ोतरी पर एसबीआई की रिपोर्ट: महंगाई और वैश्विक जोखिमों का प्रभाव
NewsPoint•
न्यू दिल्ली, 2 अक्टूबर। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) 5 से 7 अक्टूबर को बैठक करने जा रही है। इस बैठक में ब्याज दरों को लेकर एक बड़ा निर्णय लिया जाएगा। मौजूदा समय में आर्थिक हालात और महंगाई के चलते 25 आधार अंक (0.25 प्रतिशत) की ब्याज दर बढ़ाने का झुकाव साफ नजर आ रहा है। ये बातें भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की एक रिपोर्ट में कही गई हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई, वैश्विक आर्थिक स्थिति, और तरलता में बदलाव के चलते ये निर्णय लेना अनिवार्य हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक स्तर पर चल रहे भू-Political तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, और अन्य आर्थिक जोखिमों को देखते हुए, "हमारे लिए बेहतर होगा कि हम स्थिति से पीछे रहने के बजाय पहले से ही एहतियाती कदम उठाएं।" ऐसे में फसलों की उत्पादन क्षमता और मौसम की स्थिति पर ध्यान देना जरूरी हो गया है। खासकर जब इस साल के मानसून में बारिश की स्थिति सामान्य से कम रही है। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई दर जुलाई के 4.45 प्रतिशत से बढ़कर 4.82 प्रतिशत हो गई है। ये बढ़ती महंगाई दर भारतीय रुपया के गिरने का एक बड़ा कारण भी है। डॉलर के मजबूत होने के साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने लगातार बिकवाली की है, जिससे चार अरब डॉलर की निकासी हुई है।
रिपोर्ट में प्रकट चिंता यह है कि मंडी में बढ़ती सट्टेबाजी को रोकना और आरबीआई की सख्त निगरानी आवश्यक है। "हालांकि ब्याज दर में बढ़ोतरी निकट भविष्य में संभव दिखाई दे रही है, लेकिन हमें मानसून की स्थिति का भी ख्याल रखना होगा।"
रिपोर्ट के अनुसार, साल 2026 का मानसून वर्ष 2000 के बाद चौथा सबसे कम बारिश वाला वर्ष रहा है। इस दौरान लगभग 43 प्रतिशत जिलों में सामान्य से कम बारिश हुई है। अगर आल नीनो स्थिति बनी तो रबी फसलों के उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
RBI के पास बहुत से चुनौतियाँ हैं। जबकि तरलता में वृद्धि हो रही है, असल में प्रभावी तरलता की कमी महसूस हो रही है। यहां तक कि विदेशी मुद्रा प्रवाह में वृद्धि देखने को मिली है, फिर भी बैंकों के लिए नियामकीय आवश्यकताएं एक चुनौती बनकर सामने आई हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, "हमारा अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में अनुमानित 16 प्रतिशत ऋण वृद्धि को समर्थन देने के लिए, नियामकीय प्रावधानों, यूपीआई और स्पर्श संबंधी आवश्यकताओं के कारण बैंकों के स्तर पर जमा सृजन में अभी भी 8.2 लाख करोड़ रुपए का अंतर रहेगा।"
हालांकि सरकार को घबराने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन नीति निर्माताओं और नियामकों को संभावित कठिनाइयों के लिए तैयार रहना चाहिए। "जहां बदलती व्यापक आर्थिक परिस्थितियां ब्याज दर में असामान्य उपायों की मांग कर सकती हैं।"
भारत में मौद्रिक नीति को लेकर चल रही बहस और निर्णय प्रक्रिया का गहन अध्ययन करते हुए सभी कारकों को ध्यान में रखना आवश्यक है। आने वाले समय में यह देखना होगा कि यह निर्णय कैसे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा।