प्रेम कीटाणु: पहली मोहब्बत और रिश्तों की जटिलता पर आधारित फिल्म की समीक्षा

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Navbharat Times
फिल्म 'प्रेम कीटाणु' का निर्देशन अपूर्व सिंह कार्की ने किया है और इसमें कलाकारों में वीर पहाड़िया, आफिया सैयद, अपारशक्ति खुराना, राकेश बेदी और निखिल विजय शामिल हैं। यह एक रोमांटिक-कॉमेडी है, जो कि एक युवा लड़के के प्रिय के प्रति आकर्षण और दूसरे लड़के की फतेह की कोशिश को दर्शाती है। फिल्म की अवधि 2 घंटे 18 मिनट है और इसे 4 स्टार रेटिंग मिली है। इस कहानी में प्यार से जुड़ी जटिलताएं, दोस्ती और पारिवारिक रिश्तों की पेचीदगियां दिखाई गई हैं। इसके पीछे एक गहरी संदेश है कि मानसिक परिपक्वता किसी शैक्षणिक उपाधि या जन्मदिन का गुण नहीं है।

फिल्म की कहानी में हम विशाल के किरदार से मिलते हैं, जिसे वीर पहाड़िया ने निभाया है। विशाल एक हल्के-फुल्के बैकबेंचर की छवि में हैं, जो जिंदगी को बहुत गंभीरता से नहीं लेते हैं। उनकी जिंदगी आराम से चलती है, जिसमें पढ़ाई, सपने और एक करीबी दोस्त-रूममेट शामिल हैं। लेकिन जब विशाल की मुलाकात सुहानी से होती है, तब सब कुछ बदल जाता है। सुहानी का किरदार आफिया सैयद ने किया है जो समझदार, स्पष्ट विचार वाली और जिंदगी को गंभीरता से लेने वाली लड़की है। उनके बीच की केमिस्ट्री पहली मोहब्बत की नाजुकता और अनिश्चितता को अच्छे से बयां करती है।
इसके अलावा, कहानी में अपारशक्ति खुराना का किरदार रंजीत शामिल होता है, जो लव ट्रायंगल की दिशा में कहानी को आगे बढ़ाता है। यहां पर फिल्म अपने किरदारों को उनकी भावनाओं और फैसलों के साथ आगे बढ़ने का मौका देती है। विशाल की दुविधा न केवल इस बात की है कि क्या सुहानी उससे प्यार करती है, बल्कि वह खुद से भी जानना चाहता है कि वह कौन है और उसे जिंदगी में क्या चाहिए। यह पहलू फिल्म में एक गहरी भावनात्मक परत जोड़ता है।

फिल्म में राकेश बेदी भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं, जो सुहानी के पिता का किरदार निभाते हैं। उनकी कोशिशें दर्शकों को कई हंसी के पल देती हैं। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह प्यार की कहानी को बड़े होने की प्रक्रिया से जोड़ती है। विशाल और उसके माता-पिता के बीच का संबंध भी कहानी में एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। वह अपने पिता से फोन पर बातचीत करते हैं, जहां पिता बस पूछते हैं, 'क्या चाहिए?' इस सरल वार्ता में वो गहराई झलकती है, जो माता-पिता और बच्चों के बीच की दूरी को दर्शाती है।

जब विशाल को यूएस वीजा मिल जाता है, तब उसकी जिंदगी में एक और बड़ा मोड़ आता है। उसे अपने भविष्य के बड़े अवसर के बारे में सोचना पड़ता है। क्या वह सुहानी से अपने प्यार को छोड़कर विदेश जाएगा? यह और सवाल कहानी को नया मोड़ देते हैं।

फिल्म का हास्य भी इसकी एक बड़ी ताकत है, खासकर विशाल और उसके रूममेट के संवादों में। रूममेट के निराशावादी नजरिए के बारे में एक मजेदार बात है। वह कहता है, "अगर उन्हें समय दो तो पैसे चाहिए, पैसे दो तो समय चाहिए और दोनों दे दो तो स्पेस चाहिए।" यह वाक्य हंसी के साथ-साथ रिश्तों की वास्तविकता को भी दिखाता है।

सपोर्टिंग कास्ट फिल्म को और मजबूत बनाती है। राकेश बेदी अपने अनुभव के साथ कहानी में गर्मजोशी भरते हैं। फिल्म का म्यूजिक भी युवा वाइब को ध्यान में रखकर बनाया गया है। गाने जैसे 'कहो तो', 'तू मेरा रैयो' और 'इश्क का गुलाम' रोमांस के अलग-अलग मोड को दर्शाते हैं।

अपूर्व सिंह कार्की का निर्देशन फिल्म को सहज और मनोरंजक बनाता है। दीपक किंगरानी का स्क्रीनप्ले कहानी के ह्यूमर, सेटिंग और फैमिली डायनामिक्स को जोड़ता है। कुल मिलाकर, 'प्रेम कीटाणु' उस कठिन समय की कहानी है, जब आप फैसले लेने की उम्र में हैं, पर हर फैसले को लेकर सवाल उठाते हैं।

यह फिल्म केवल पहली मोहब्बत, दोस्ती, दिल टूटने और अपने जीवन का रास्ता चुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दर्शाती है कि प्यार के साथ-साथ जिम्मेदारी और रिश्तों की नजाकत को समझना भी ज़रूरी है। वीर पहाड़िया और आफिया सैयद की जोड़ी दर्शकों को एक अनोखा अनुभव प्रदान करती है। फिल्म का ह्यूमर, म्यूजिक और पारिवारिक रिश्ते इसे एक आकर्षक थिएट्रिकल वॉच बनाते हैं।

इस तरह, 'प्रेम कीटाणु' एक अद्भुत कहानी है, जो अपने दर्शकों को हंसाते हुए उनके दिलों में जगह बनाती है। फिल्म इस मायने में भी खास है कि यह रिश्तों के जटिल सवालों पर विचार करती है और साथ ही मोहब्बत और परिपक्वता के सफर को चित्रित करती है।

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