आरबीआई के ब्याज दरों में 0.25 प्रतिशत बढ़ोतरी की संभावना, एसबीआई की रिपोर्ट में खुलासा

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नई दिल्ली, 2 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक 5 से 7 अक्टूबर तक होने वाली है। इस बैठक में यह तय होगा कि बेंचमार्क रेपो रेट को 25 आधार अंक (0.25 प्रतिशत) बढ़ाना है या नहीं। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में गिरावट और अन्य आर्थिक जोखिमों के कारण ब्याज दर बढ़ाने की जरूरत महसूस हो रही है। ऐसी संभावना है कि आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति को और सख्त कर सकता है।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि महंगाई के दबाव में लगातार वृद्धि हो रही है। अगस्त महीने में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महंगाई दर जुलाई के 4.45 प्रतिशत से बढ़कर 4.82 प्रतिशत तक पहुँच गई है। इस बढ़ती हुई महंगाई से निपटने के लिए आरबीआई को सख्त कदम उठाने की आवश्यकता है। रिपोर्ट में कहा गया, “हमें यह भी उम्मीद है कि आरबीआई वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी वृद्धि के अनुमान में 30 आधार अंक और महंगाई के अनुमान में 20 आधार अंक की बढ़ोतरी करेगा।”
इसके अलावा, भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और डॉलर इंडेक्स में मजबूती आ रही है। पिछले शुक्रवार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की बिकवाली के कारण 4.45 अरब डॉलर की निकासी हुई है। ऐसे में आरबीआई को यह सुनिश्चित करना होगा कि सट्टेबाजी वाली ताकतों का प्रभाव कम किया जा सके। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आरबीआई की आंतरिक मजबूती की बड़ी परीक्षा होगी।

रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि हाल ही में का मानसून, जो 2000 के बाद का चौथा सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा, के कारण कृषि उत्पादन पर असर हो सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि अक्टूबर महीने में बारिश कम होती है, तो यह रबी फसलों के उत्पादन के लिए और अधिक जोखिम पैदा कर सकता है।

कुल मिलाकर यह देखा जा रहा है कि वर्तमान समय में भारत में तरलता अधिक है, लेकिन वास्तविक स्तर पर प्रभावी तरलता का सृजन काफी कम है। रिकॉर्ड 143.5 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा प्रवाह के बावजूद, बैंकों द्वारा अतिरिक्त जमा राशि के इस्तेमाल को सीमित करने वाले नियमों के कारण वास्तविक तरलता का प्रभाव सीमित हो गया है।

एसबीआई की रिपोर्ट में कहा गया है, “हमारा अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में अनुमानित 16 प्रतिशत ऋण वृद्धि को समर्थन देने के लिए, नियामकीय प्रावधानों, यूपीआई और स्पर्श संबंधी आवश्यकताओं के कारण बैंकों के स्तर पर जमा सृजन में अभी भी 8.2 लाख करोड़ रुपए का अंतर रहेगा।”

हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार, भारत के लिए घबराने की बात नहीं है। लेकिन नीति निर्माताओं और नियामकों के लिए बेहतर होगा कि वे ऐसी संभावित स्थिति के लिए तैयार रहें, जहाँ बदलती व्यापक आर्थिक परिस्थितियाँ असामान्य ब्याज दर संबंधी उपायों को अपनाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। सभी इन मुद्दों पर सटीक नजर रखनी होगी ताकि अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव बना रहे।

समाप्ति में कहा जा सकता है कि आरबीआई की ओर से उठाए जाने वाले कदम महंगाई और आर्थिक स्थितियों से निपटने में महत्वपूर्ण होंगे। इन सभी बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए, अगले कुछ दिनों में निर्णय लिया जाएगा, जो भारतीय आर्थिक माहौल को प्रभावित करेगा।

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