जन्माष्टमी पर 40 हजार करोड़ से ज्यादा व्यापार की उम्मीद, सनातन अर्थव्यवस्था को मिलेगा बढ़ावा

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नई दिल्ली, 3 सितंबर: देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व आस्था और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस बार जन्माष्टमी पर 40 हजार करोड़ रुपये से अधिक के व्यापार का अनुमान है, जो इसे भारत की 'सनातन अर्थव्यवस्था' का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बनाता है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) के अनुसार, यह अनुमान विभिन्न क्षेत्रों में होने वाली बिक्री, घरों और मंदिरों की सजावट, धार्मिक आयोजनों, और धार्मिक पर्यटन पर आधारित है। सीएआईटी के सेक्रेटरी जनरल और भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि जन्माष्टमी सिर्फ भक्ति का ही नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपराओं, सामाजिक भागीदारी और आर्थिक गतिविधियों का भी संगम है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल' के आह्वान का असर भी त्योहारों के बाजारों में दिख रहा है, जिससे भारतीय उत्पादों और स्थानीय व्यवसायों को बढ़ावा मिल रहा है।

प्रवीण खंडेलवाल ने इस बात पर जोर दिया कि जन्माष्टमी से जुड़ी हर रस्म और जश्न लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। किसान, डेयरी उत्पादक, फूलवाले, मिठाई विक्रेता, कपड़े के व्यापारी, मूर्तिकार, कारीगर, महिला उद्यमी, ट्रांसपोर्टर, होटल और रेस्टोरेंट मालिक, और सेवा प्रदाता इस त्योहार से सीधे या परोक्ष रूप से लाभान्वित होते हैं। सीएआईटी के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में जन्माष्टमी का व्यापार लगभग 25 हजार करोड़ रुपये था, जो 2025 में बढ़कर 30 हजार करोड़ रुपये हो गया था। इस वर्ष, ग्राहकों की बढ़ती मांग, सामान और सेवाओं की कीमतों में बदलाव, सामाजिक उत्सवों में वृद्धि, धार्मिक पर्यटन में बढ़ोतरी, और डिजिटल कॉमर्स के विकास के कारण व्यापार में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद है, जिससे यह 40 हजार करोड़ रुपये को पार कर जाएगा।
इस साल जन्माष्टमी पर माखन-मिश्री, दूध, दही, पनीर जैसे डेयरी उत्पाद, मिठाइयां, फल, सूखे मेवे, पूजा का सामान, फूलों की मालाएं, सजावटी सामान, लड्डू गोपाल की मूर्तियां, मुकुट, बांसुरी, मोर पंख, आभूषण और त्योहार के खास कपड़े जैसे उत्पादों की मांग खास तौर पर ज्यादा है। खंडेलवाल ने कहा कि भारतीय त्योहारों को केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन मानना उनके असली महत्व को कम आंकना होगा। दिवाली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी, दुर्गा पूजा, करवा चौथ, छठ पूजा जैसे त्योहार लाखों व्यापारियों, कारीगरों, किसानों, महिला उद्यमियों और सेवा प्रदाताओं के लिए आर्थिक अवसरों का एक बड़ा नेटवर्क बनाते हैं।

उन्होंने आगे कहा कि भारतीय त्योहारों की सबसे खास बात यह है कि इन मौकों पर होने वाला खर्च सिर्फ उपभोग तक सीमित नहीं रहता। यह आय और रोजगार के रूप में समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचता है। यह प्रक्रिया भारत की जमीनी स्तर की, समावेशी और विकेंद्रीकृत 'सनातन अर्थव्यवस्था' को मजबूत करती है। जन्माष्टमी के दौरान लाखों श्रद्धालु देश भर में मथुरा-वृंदावन, द्वारका, नाथद्वारा, दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद, इंदौर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कृष्ण के अन्य प्रमुख मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर त्योहार मनाएंगे। इससे धार्मिक पर्यटन को काफी बढ़ावा मिलेगा और होटल, ट्रांसपोर्ट, रेस्टोरेंट, प्रसाद की बिक्री, फूलों, स्थानीय हस्तशिल्प और संबंधित सेवाओं में अच्छी-खासी आर्थिक गतिविधि होगी।

खंडेलवाल ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि भारत की 'धार्मिक अर्थव्यवस्था' को अब सिर्फ आध्यात्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक बड़े आर्थिक इकोसिस्टम के तौर पर भी पहचाना जाना चाहिए जो रोजगार, पर्यटन, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और छोटे व्यवसायों को सहारा देता है। यह त्योहार सिर्फ भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था के पहियों को घुमाने वाला एक महत्वपूर्ण अवसर भी है।

यह त्योहार 'वोकल फॉर लोकल' की भावना को भी बढ़ावा देता है। लोग अब स्थानीय रूप से बने उत्पादों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं। इससे छोटे व्यवसायों, कुटीर उद्योगों और हस्तशिल्प को नई जान मिल रही है। जन्माष्टमी के दौरान बिकने वाली लड्डू गोपाल की मूर्तियां, बांसुरी, मोर पंख, और सजावटी सामान अक्सर स्थानीय कारीगरों द्वारा बनाए जाते हैं, जो उनकी आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

त्योहारों के दौरान होने वाली खरीदारी से न केवल बड़े व्यापारी बल्कि छोटे दुकानदार और फेरीवाले भी लाभान्वित होते हैं। मिठाई की दुकानों पर भीड़, फूलों की दुकानों पर रौनक, और कपड़ों के बाजारों में चहल-पहल - यह सब मिलकर एक जीवंत आर्थिक गतिविधि का निर्माण करते हैं। डेयरी उत्पादों की मांग में वृद्धि से किसानों और डेयरी किसानों को भी फायदा होता है।

धार्मिक पर्यटन का पहलू भी बहुत महत्वपूर्ण है। जन्माष्टमी के अवसर पर लोग अपने प्रिय मंदिरों में दर्शन के लिए जाते हैं। इससे होटल, परिवहन, और स्थानीय खान-पान के व्यवसायों को बढ़ावा मिलता है। प्रसाद की बिक्री, फूलों की मालाएं, और मंदिर के आसपास बिकने वाली छोटी-मोटी चीजें भी स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान करती हैं।

सीएआईटी के अनुमानों से पता चलता है कि भारतीय त्योहारों में आर्थिक क्षमता कितनी अधिक है। यह सिर्फ एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह पूरे साल चलने वाली आर्थिक गतिविधियों की एक श्रृंखला को गति देता है। त्योहारों के दौरान होने वाला खर्च सिर्फ उपभोग नहीं है, बल्कि यह निवेश और रोजगार सृजन का एक रूप है।

प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'वोकल फॉर लोकल' के आह्वान का असर देश भर के त्योहारों वाले बाजारों में साफ दिख रहा है। भारतीय उत्पादों को ज्यादा प्राथमिकता मिल रही है। जिससे स्थानीय व्यापार, कुटीर उद्योगों, हस्तशिल्प और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को काफी बढ़ावा मिल रहा है। पूजा के सामान से लेकर सजावट और धार्मिक उत्पादों तक, जन्माष्टमी के दौरान स्वदेशी सामान की भारी मांग रहती है।

उन्होंने यह भी बताया कि जन्माष्टमी से जुड़ी हर रस्म और जश्न लाखों लोगों की आजीविका से जुड़ा है। किसान, डेयरी उत्पादक, फूल उगाने वाले, मिठाई बनाने वाले, कपड़े के व्यापारी, मूर्तिकार, कारीगर, महिला उद्यमी, ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर, होटल और रेस्टोरेंट के मालिक और कई तरह की सेवाएं देने वाले लोग इस त्योहार से सीधे या परोक्ष रूप से फायदा उठाते हैं।

सीएआईटी के अनुसार, 2024 में जन्माष्टमी के दौरान व्यापार लगभग 25 हजार करोड़ रुपए था और 2025 में यह बढ़कर लगभग 30 हजार करोड़ रुपए हो गया। इस वर्ष, ग्राहकों की ज्यादा मांग, सामान और सेवाओं की कीमतों में बदलाव, बढ़ते सामाजिक उत्सव, धार्मिक पर्यटन में बढ़ोतरी, और मॉडर्न रिटेल व डिजिटल कॉमर्स के विकास के कारण, व्यापार में लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि होने और इसके 40 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा होने की उम्मीद है।

खंडेलवाल की ओर से इस बात पर जोर दिया गया है कि भारतीय त्योहारों को सिर्फ धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन मानना उनके असली महत्व को कम करके आंकना होगा। दिवाली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्रि, गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी, दुर्गा पूजा, करवा चौथ, छठ पूजा और कई अन्य त्योहार लाखों व्यापारियों, कारीगरों, शिल्पकारों, किसानों, महिला उद्यमियों, स्वरोजगार करने वाले लोगों और सेवा प्रदाताओं के लिए आर्थिक अवसरों का एक बड़ा नेटवर्क बनाते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय त्योहारों की सबसे खास बात यह है कि इन मौकों पर होने वाला खर्च सिर्फ उपभोग तक सीमित नहीं रहता; बल्कि यह आय और रोजगार के रूप में समाज के अलग-अलग वर्गों तक पहुंचता है। यह प्रक्रिया भारत की जमीनी स्तर की, समावेशी और विकेंद्रीकृत "सनातन अर्थव्यवस्था" को मजबूत करती है।

खंडेलवाल ने कहा कि जन्माष्टमी के दौरान लाखों श्रद्धालु देश भर में अलग-अलग तरीकों से यह त्योहार मनाएंगे, खासकर मथुरा-वृंदावन, द्वारका, नाथद्वारा, दिल्ली, मुंबई, जयपुर, अहमदाबाद, इंदौर, यूपी, महाराष्ट्र, राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़ और कृष्ण के अन्य प्रमुख मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर। इससे धार्मिक पर्यटन को काफी बढ़ावा मिलेगा और होटल, ट्रांसपोर्ट, रेस्टोरेंट, प्रसाद की बिक्री, फूलों, स्थानीय हस्तशिल्प और संबंधित सेवाओं में अच्छी-खासी आर्थिक गतिविधि होगी। उन्होंने कहा कि भारत की 'धार्मिक अर्थव्यवस्था' को अब सिर्फ आध्यात्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक बड़े आर्थिक इकोसिस्टम के तौर पर भी पहचाना जाना चाहिए जो रोजगार, पर्यटन, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और छोटे व्यवसायों को सहारा देता है।