निकारागुआ के एम्बेसडर ने AIIA का दौरा किया, आयुर्वेद को बढ़ावा देने के लिए एमओयू जल्द

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नई दिल्ली, 10 सितंबर (आईएएनएस). ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद (एआईआईए) के डायरेक्टर, प्रोफेसर (वैद्य) प्रदीप कुमार प्रजापति ने गुरुवार को बताया कि निकारागुआ की एम्बेसडर नादेस्का कुथबर्ट ने एआईआईए का दौरा किया और दोनों देशों के बीच आयुर्वेद के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए जल्द ही एक एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किए जाएंगे. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में, हम पूरे देश को आयुर्वेद के आहार-विहार के महत्व को समझाने के लिए एक जन आंदोलन की तैयारी कर रहे हैं. कई देशों में आयुर्वेद से जुड़ी प्राचीन प्रथाओं का उपयोग हो रहा है, लेकिन हम उनके पीछे के वैज्ञानिक प्रमाणों पर भी जोर देते हैं, क्योंकि इसके बिना लोग उन पर विश्वास नहीं करते. इसलिए, हम अपने सभी कॉलेजों, अनुसंधान संस्थानों और विकसित देशों में मौजूद अपने केंद्रों से आग्रह करते हैं कि वे इन बातों को वैज्ञानिक पृष्ठभूमि और साक्ष्य के साथ अधिक से अधिक प्रस्तुत करें ताकि यह आम लोगों तक पहुंच सके. प्रोफेसर प्रजापति ने कहा कि जब हम जन आंदोलन की बात करते हैं, तो हमारा लक्ष्य होता है कि आयुर्वेद घर-घर पहुंचे और हर व्यक्ति इससे जुड़े. यदि हम अपने खान-पान और जीवनशैली को संतुलित कर लें, तो हमें दवाओं की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और तकनीकी विकास के दौर में, लोग चाहकर भी 6 से 7 घंटे स्क्रीन के सामने बिता देते हैं. इस अत्यधिक स्क्रीन टाइम के कारण लोगों को कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. ऐसी स्थिति में, स्वस्थ रहने के लिए आयुर्वेद और योग को अपनाना बहुत जरूरी हो गया है. आजकल लोगों की जीवनशैली सिर्फ खाने, सोने, काम करने और घूमने तक सीमित रह गई है. इसलिए, स्वस्थ रहने के लिए अपनी दिनचर्या में आयुर्वेद और योग को शामिल करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. प्रोफेसर प्रजापति ने इस बात पर जोर दिया कि इसके लिए हमें अपनी दिनचर्या और ऋतुचर्या (मौसम के अनुसार जीवनशैली) को संतुलित करने की आवश्यकता है. हमारे पूर्वजों द्वारा बताई गई बातें आज भी बहुत फायदेमंद हैं.
उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि आज किसी व्यक्ति को विटामिन-डी, कैल्शियम या फास्फोरस की कमी हो रही है, तो यह सीधे तौर पर हमारे खान-पान और रहन-सहन से जुड़ा है. यदि हम सुबह जल्दी उठें, सूर्योदय के समय सूरज के सामने टहलें और व्यायाम करें, तो धीरे-धीरे हमारे शरीर में विटामिन-डी की कमी अपने आप ठीक हो जाएगी. इससे ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का कमजोर होना) और ऑस्टियोपीनिया (हड्डियों का घनत्व कम होना) जैसी समस्याएं सामने नहीं आएंगी. इसलिए, आयुर्वेद को एक जन आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाना और भी आवश्यक हो जाता है.

प्रोफेसर प्रजापति ने आयुष मंत्री को धन्यवाद देते हुए कहा कि उन्होंने इस जन आंदोलन की कमान संभाली और इसकी कल्पना की. इस वर्ष आयुर्वेद दिवस की थीम ‘आयुर्वेद फॉर ए हेल्थियर टुमारो’ (स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद) है. उन्होंने बताया कि आयुर्वेद के नियम बहुत सरल हैं. जैसे हमारे घर के बड़े-बुजुर्ग सुबह जल्दी उठते हैं, समय पर खाते-पीते और सोते हैं, और दिन में कुछ समय शारीरिक और मानसिक व्यायाम करते हैं. हमें भी इसी तरह इन आदतों को अपने जीवन में लागू करना चाहिए.

आजकल हम पूरी तरह से टेक्नोलॉजी पर निर्भर होते जा रहे हैं, लेकिन यह सही नहीं है. यदि हम इसी तरह टेक्नोलॉजी पर निर्भर रहे, तो एक दिन ऐसा आएगा जब टेक्नोलॉजी हम पर हावी हो जाएगी. इसके लिए हमें अपनी जीवनशैली में बदलाव लाने की जरूरत है और इस संदेश को घर-घर तक पहुंचाना है. प्रोफेसर प्रजापति का मानना है कि यदि हम अपने खान-पान और रहन-सहन को संतुलित कर लें, तो 50 प्रतिशत बीमारियां अपने आप खत्म हो जाएंगी.

उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि आयुर्वेद केवल बीमारियों के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण जीवन पद्धति है. यह हमें प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीना सिखाता है. जब हम प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं, तो हमारा शरीर स्वाभाविक रूप से स्वस्थ रहता है. आज की आधुनिक जीवनशैली में, जहां हम कृत्रिम वातावरण में अधिक समय बिताते हैं और प्राकृतिक चीजों से दूर होते जा रहे हैं, आयुर्वेद हमें फिर से प्रकृति से जुड़ने का मार्ग दिखाता है.

प्रोफेसर प्रजापति ने बताया कि एआईआईए निकारागुआ जैसे देशों के साथ मिलकर आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए काम कर रहा है. यह एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि आयुर्वेद के ज्ञान का लाभ दुनिया भर के लोगों तक पहुंचना चाहिए. एमओयू पर हस्ताक्षर होने से दोनों देशों के बीच अनुसंधान, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे. यह न केवल भारत के लिए बल्कि निकारागुआ के लिए भी फायदेमंद होगा, क्योंकि वे भी अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में रुचि रखते हैं.

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आयुर्वेद के वैज्ञानिक प्रमाणों को सामने लाना बहुत जरूरी है. केवल प्राचीनता के आधार पर नहीं, बल्कि आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही लोग इसे पूरी तरह से अपनाएंगे. एआईआईए जैसे संस्थान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जो आयुर्वेद के सिद्धांतों पर वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं और उनके परिणामों को प्रकाशित कर रहे हैं. यह शोध आयुर्वेद को एक विश्वसनीय और प्रभावी चिकित्सा प्रणाली के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा.

प्रोफेसर प्रजापति ने युवाओं से विशेष रूप से अपील की कि वे अपनी जीवनशैली में आयुर्वेद और योग को शामिल करें. आज की युवा पीढ़ी को अक्सर तनाव, चिंता और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ता है. आयुर्वेद और योग न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को भी मजबूत करते हैं. यह उन्हें एक संतुलित और खुशहाल जीवन जीने में मदद करेगा.

अंत में, उन्होंने एक बार फिर इस बात को दोहराया कि आयुर्वेद को जन आंदोलन बनाना हम सबकी जिम्मेदारी है. यह केवल सरकार या संस्थानों का काम नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति को इसमें सक्रिय रूप से भाग लेना होगा. अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलाव करके, हम न केवल अपने स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ भविष्य का निर्माण भी कर सकते हैं. आयुर्वेद का ज्ञान एक अनमोल धरोहर है, और इसे संरक्षित और प्रचारित करना हमारा कर्तव्य है.

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