राजस्थान: पूर्व सरपंचों की मुश्किलें बढ़ीं, गबन के आरोप में चुनाव लड़ने पर रोक की संभावना
राजस्थान: पूर्व सरपंचों की मुश्किलें बढ़ीं, गबन के आरोप में चुनाव लड़ने पर रोक की संभावना
NewsPoint•
राजस्थान में पंचायत चुनाव से पहले एक हजार से ज्यादा पूर्व सरपंचों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। भ्रष्टाचार, सरकारी फंड में गबन और पद के दुरुपयोग के आरोपों में फंसे इन पूर्व सरपंचों के आगामी चुनाव लड़ने पर रोक लग सकती है। पंचायतीराज विभाग ऐसे पूर्व सरपंचों की सूची बना रहा है, जिन पर पंचायतों के विकास के लिए जारी सरकारी पैसे के गलत इस्तेमाल या गबन के आरोप हैं। इनमें सबसे ज्यादा मामले अलवर जिले से सामने आ रहे हैं। अगर इन पूर्व सरपंचों ने गबन की गई राशि जमा नहीं कराई, तो उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) नहीं मिलेगा, जिससे उनकी उम्मीदवारी खतरे में पड़ जाएगी।
पंचायतीराज विभाग के सचिव और आयुक्त जोगाराम ने बताया कि कई पूर्व सरपंचों ने अपने कार्यकाल में पैसों का गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, "पंचायतों के विकास के लिए सरकार की ओर से जारी राशि का कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया।" अब ऐसे मामलों में संबंधित पूर्व सरपंचों से सरकारी पैसे की वसूली की जा रही है। जोगाराम ने यह भी साफ किया कि जिन पूर्व सरपंचों पर सरकारी राशि के गबन का आरोप है, उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जा सकती है। इसके लिए चुनाव के दौरान NOC की व्यवस्था बहुत अहम होगी।अलवर जिला इस मामले में सबसे आगे है। जून 2026 में अलवर जिला परिषद ने एक नोटिस जारी किया था। इसमें कहा गया था कि जिन पूर्व सरपंचों पर गबन की गई राशि बकाया है, उन्हें पहले यह पैसा जमा कराना होगा। जब तक वे यह राशि जमा नहीं करते, तब तक चुनाव लड़ने के लिए NOC नहीं दी जाएगी। ऐसे में जो पूर्व सरपंच चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं, उनके सामने अब सरकारी पैसा जमा कराने की बड़ी चुनौती है। अगर उन्हें NOC नहीं मिली, तो चुनाव लड़ने की उनकी सारी तैयारी धरी की धरी रह जाएगी।
अलवर के अलावा राजस्थान के कई जिलों में भी बड़ी संख्या में पूर्व सरपंच इस कार्रवाई के दायरे में हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उदयपुर में 125, जयपुर में 70, बीकानेर में 40, डूंगरपुर में 35, बांसवाड़ा में 60, जैसलमेर में 25 और बाड़मेर में 45 पूर्व सरपंचों के चुनाव लड़ने पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इसके अलावा भरतपुर में 60, धौलपुर में 30, प्रतापगढ़ में 40, दौसा में 70, कोटा में 45 और करौली में 25 पूर्व सरपंचों के मामले सामने आए हैं। धौलपुर के लिए एक अलग आंकड़ा 20 का भी बताया गया है।
पंचायतीराज विभाग की इस कार्रवाई का मुख्य मकसद सरकारी पैसों की वसूली करना और पंचायतों में पैसों के मामले में जवाबदेही तय करना है। विभाग ऐसे सभी मामलों का रिकॉर्ड तैयार कर रहा है और संबंधित पूर्व सरपंचों से बकाया राशि जमा कराने की प्रक्रिया पर काम कर रहा है। पंचायत चुनाव से ठीक पहले अगर इन पूर्व सरपंचों को NOC नहीं मिली, तो उनकी चुनावी योजनाओं को बड़ा झटका लगेगा। इसका असर ग्रामीण इलाकों की राजनीति पर भी पड़ेगा, क्योंकि कई पूर्व सरपंच फिर से चुनाव लड़ने की सोच रहे थे।
यह पूरा मामला सरकारी पैसों के सही इस्तेमाल और जवाबदेही से जुड़ा है। जब सरकार पंचायतों के विकास के लिए पैसा भेजती है, तो यह उम्मीद की जाती है कि उसका इस्तेमाल सही तरीके से हो। लेकिन कुछ पूर्व सरपंचों पर आरोप हैं कि उन्होंने इस पैसे का गबन किया या उसका गलत इस्तेमाल किया। अब चुनाव से पहले विभाग यह सुनिश्चित कर रहा है कि ऐसे लोग फिर से चुनाव न लड़ पाएं, जब तक कि वे अपने किए की भरपाई न कर दें। यह एक तरह से सिस्टम को साफ करने की कोशिश है, ताकि भविष्य में ऐसा न हो।
NOC यानी अनापत्ति प्रमाण पत्र एक तरह की मंजूरी होती है। चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को कई तरह के प्रमाण पत्र जमा करने होते हैं। अगर किसी पूर्व सरपंच पर सरकारी पैसे गबन करने का आरोप है और उसने वह पैसा वापस नहीं किया है, तो उसे यह NOC नहीं मिलेगी। इसके बिना वह चुनाव नहीं लड़ पाएगा। यह नियम उन लोगों के लिए एक सबक की तरह है जो सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाते हैं।
अलवर जिले में सबसे ज्यादा मामले होने का मतलब है कि वहां इस तरह की वित्तीय अनियमितताएं ज्यादा हुई हैं। यह चिंता का विषय है कि विकास के लिए आया पैसा अगर गलत हाथों में चला जाए, तो विकास कैसे होगा। विभाग की यह कार्रवाई उन सभी पूर्व सरपंचों के लिए चेतावनी है जो सरकारी पैसों का दुरुपयोग करते हैं। यह सुनिश्चित करेगा कि चुनाव में वही लोग खड़े हों जिन पर कोई बड़ा आरोप न हो या जिन्होंने अपने गलत कामों की भरपाई कर दी हो।
यह देखना दिलचस्प होगा कि कितने पूर्व सरपंच चुनाव से पहले अपनी बकाया राशि जमा करा पाते हैं और कितने लोग NOC हासिल कर पाते हैं। इस कार्रवाई से ग्रामीण राजनीति में काफी हलचल मचने की उम्मीद है। जो लोग चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे, उन्हें अब अपनी वित्तीय स्थिति सुधारनी होगी। यह कदम सरकारी पैसों की सुरक्षा और पंचायतों में पारदर्शिता लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।