राहुल गांधी का सवाल: सरकारी ठेकों में दलित, आदिवासी, ओबीसी की भागीदारी पर सरकार के पास डेटा क्यों नहीं?

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकारी निर्माण ठेकों में दलित, आदिवासी और ओबीसी उद्यमियों की भागीदारी पर सरकार से सवाल पूछे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के पास इन वर्गों को दिए गए ठेकों का कोई डेटा नहीं है। यह बात तब सामने आई जब उन्होंने लोकसभा में यह सवाल उठाया।

rahul gandhis question to the government on dalit adivasi obc participation in government contracts why no data
नई दिल्ली, 7 अप्रैल: कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भारत में सरकारी निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर के बड़े ठेकों में दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी) के उद्यमियों को शामिल न किए जाने पर सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने फेसबुक पर लिखा कि पिछले साल 16,500 करोड़ रुपये के सार्वजनिक निर्माण ठेकों में इन वर्गों के व्यवसायों को कितना हिस्सा मिला, इसका पता लगाने की कोशिश की तो पता चला कि सरकार के पास इसका कोई डेटा ही नहीं है। यह बात तब सामने आई जब राहुल गांधी ने लोकसभा में एक सवाल उठाया था।

राहुल गांधी ने लोकसभा में अतारांकित प्रश्न संख्या 6264 के जरिए पिछले पांच सालों में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा दिए गए सार्वजनिक निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर ठेकों की कुल संख्या और कीमत के बारे में जानकारी मांगी थी। उन्होंने यह भी पूछा था कि कितने ठेके एससी/एसटी और ओबीसी के स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए और क्या सरकार ने एससी/एसटी स्वामित्व वाले उद्यमों के लिए तय 4 प्रतिशत का लक्ष्य पूरा किया है। साथ ही, उन्होंने यह भी जानना चाहा कि क्या ओबीसी स्वामित्व वाले व्यवसायों के लिए भी ऐसा कोई लक्ष्य बनाने की योजना है।
इस सवाल के जवाब में केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री तोखन साहू ने बताया कि कुल ठेकों का डेटा तो उपलब्ध है, लेकिन एससी/एसटी और ओबीसी स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए ठेकों को ट्रैक करने का कोई सिस्टम फिलहाल नहीं है। मंत्री ने इसका कारण बताते हुए कहा कि निर्माण ठेकों के लिए यह ट्रैकिंग अनिवार्य नहीं है।

राहुल गांधी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सरकार की अपनी नीति है कि लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) से कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक खरीद होनी चाहिए, जिसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व वाले व्यवसायों के लिए 4 प्रतिशत का हिस्सा तय है। लेकिन, जब बात सबसे बड़े और मुनाफे वाले ठेकों, यानी सार्वजनिक निर्माण के ठेकों की आती है, तो सरकार कहती है कि यह अनिवार्य नहीं है।

राहुल गांधी ने इसे सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं माना, बल्कि उन्होंने इसे एक ऐसा सिस्टम बताया जो जानबूझकर मोदी सरकार की नीतियों के जरिए सामाजिक और आर्थिक न्याय को कमजोर कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है।

संसदीय आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण ठेकों की संख्या और उनकी कीमत लगातार बढ़ी है। अकेले 2025-26 में ही 8,402 ठेके दिए गए, जिनकी कुल कीमत 16,587 करोड़ रुपये थी। यह आंकड़ा दिखाता है कि सरकारी ठेकों का बाजार कितना बड़ा है, और इसमें दलित, आदिवासी और ओबीसी उद्यमियों की भागीदारी न होना एक बड़ी चिंता का विषय है।

सरकार का यह कहना कि निर्माण ठेकों के लिए एससी/एसटी और ओबीसी व्यवसायों को दिए गए ठेकों की ट्रैकिंग अनिवार्य नहीं है, यह दर्शाता है कि इन वर्गों के व्यवसायों को बड़े सरकारी प्रोजेक्ट्स में शामिल करने के प्रति सरकार कितनी गंभीर है। राहुल गांधी का आरोप है कि यह जानबूझकर किया जा रहा है ताकि सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देने वाली नीतियों को कमजोर किया जा सके। यह मुद्दा सरकारी खरीद में समावेशिता और निष्पक्षता पर एक महत्वपूर्ण बहस छेड़ता है।