ISIS-JK मामले में दो आरोपी बरी: अदालत ने जांच में खामियां बताईं, अभियोजन पक्ष विफल

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दिल्ली की एक अदालत ने आईएसआईएस-जेके से जुड़े दो आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने जांच में खामियां पाईं और कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में विफल रहा। दोनों को हथियार और गोला-बारूद जुटाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

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नई दिल्ली, 20 मार्च (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन आईएसआईएस से जुड़े दो व्यक्तियों को बरी कर दिया है। इन पर आरोप था कि वे इस्लामिक स्टेट जम्मू-कश्मीर (आईएसआईएस-जेके) के सदस्यों के लिए उत्तर प्रदेश से हथियार और गोला-बारूद जुटा रहे थे। अदालत ने जांच में पाई गई खामियों को उजागर करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमित बंसल ने कश्मीर के शोपियां निवासी जमशेद जहूर पॉल और परवेज राशिद लोन को बरी कर दिया। इन दोनों को साल 2018 में गिरफ्तार किया गया था। दिल्ली पुलिस के विशेष प्रकोष्ठ ने इन पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 18 (षड्यंत्र के लिए दंड) और 20 (आतंकवादी संगठन का सदस्य होने के लिए दंड) के साथ-साथ शस्त्र अधिनियम के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया था।
पुलिस का दावा था कि 6 सितंबर 2018 को उन्हें सूचना मिली थी कि पॉल और लोन, जो कथित तौर पर आईएसआईएस से जुड़े थे, आतंकवादी गतिविधियों के लिए हथियार खरीदने दिल्ली आए हैं। विशेष प्रकोष्ठ के अनुसार, दोनों को लाल किले के पास नेताजी सुभाष मार्ग पर जामा मस्जिद बस स्टॉप से गिरफ्तार किया गया था। उनकी तलाशी में 7.65 एमएम की दो पिस्तौल और दस कारतूस बरामद हुए थे।

गुरुवार को सुनाए गए 79 पन्नों के फैसले में अदालत ने साफ कहा, "अभियोजन पक्ष दोनों आरोपियों के विरुद्ध अपना मामला संदेह से परे सिद्ध करने में विफल रहा है। अतः दोनों आरोपियों को बरी किया जाता है।" अदालत ने यह भी कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि आरोपियों ने कथित साजिश के तहत हथियार खरीदे या एकत्र किए थे। साथ ही, यह भी साबित नहीं हो सका कि उन्होंने बीबीएम (ब्लैकबेरी मैसेंजर) और व्हाट्सऐप के माध्यम से अपने आकाओं और सह-आरोपियों से संपर्क किया था। अदालत ने यह भी पाया कि 6 सितंबर 2018 से पहले की अवधि में भी उनके आईएसआईएस के सदस्य होने का आरोप सिद्ध नहीं हो सका।

यह मामला आतंकवाद से जुड़ा होने के कारण काफी गंभीर था। पुलिस ने इन दोनों पर आईएसआईएस जैसे खतरनाक संगठन के लिए काम करने और हथियार जुटाने का आरोप लगाया था। लेकिन, अदालत में पुलिस इन आरोपों को पुख्ता सबूतों के साथ साबित नहीं कर पाई। अदालत ने अपनी टिप्पणी में जांच प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए, जिससे यह साफ हुआ कि सबूतों को ठीक से इकट्ठा नहीं किया गया था या उन्हें अदालत में पेश करने में खामियां थीं।

इस फैसले से यह भी पता चलता है कि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पुख्ता सबूतों की जरूरत होती है। सिर्फ आरोप लगा देना काफी नहीं होता। अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी निर्दोष को सजा न मिले। यह फैसला न्यायपालिका की निष्पक्षता को भी दर्शाता है, जहां कानून के अनुसार ही निर्णय लिया जाता है।