उनके कोई बैंक खाते नहीं होते थे, इसलिए कस्टमर से मिलने वाले पैसे कभी तस्वीर के पीछे तो कभी अख़बार के नीचे रखती थीं। खाते इसलिए नहीं खुलते कि उनके स्थायी पते-ठिकाने नहीं होते थे। वे एक दिन में 50-50 गुटखे खातीं, ताकि भूख न लगे और बॉडी को स्लिम रखा जा सके। उनके नाम कभी असली नहीं होते। वे मर्दों की दूसरी-तीसरी बीवियां होतीं।
बार बालाओं की इन दास्तानों को भले ही मुंबई और उपनगर पीछे छोड़ चुके हों, लेकिन इसका बदला स्वरूप अब तेजी से महंगे होटल, पबों और क्लबों में दिखने लगा है। हालांकि, इसे जितना सभ्य और सलीकेदार दिखाने की कोशिश की जाती है, उतना दिखता नहीं।
और फिर एक रोज सब बदल गया । मुंबई के डांस बार कभी देशभर में मशहूर थे। फिल्मों ने भी इन्हें खूब भुनाया। शाम होते ही ये गुलजार हो जाते। फिर आया साल 2005, सरकार ने इन्हें बैन कर दिया और करीब 75 हजार बार बालाओं के सामने रोजी का संकट खड़ा हो गया। अधिकतर ऐसी थीं, जिन्हें डांस के सिवाय कोई काम नहीं आता था। हालांकि, 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि डांस बार को सरकार रेगुलेट कर सकती है, लेकिन पूरी तरह बैन नहीं लगा सकती। आज डांस बार के नियम बहुत सख्त हैं। कई मामलों में डांस बार की जगह ऑर्केस्ट्रा बार का लाइसेंस दिया जाता है।
बार बालाओं की ज़िंदगी में झांकती किताब । पत्रकार सोनिया फलेरो की किताब ‘ब्यूटीफुल थिंग’ मुंबई और मीरा रोड के डांस बारों पर आधारित है। उन्होंने पांच साल इस दुनिया को करीब से देखा है। उन्होंने केंद्रीय पात्र लीला के माध्यम से बताया है कि एक बार बाला के जीवन की विवशताएं, उसके रिश्तों का ताना-बाना और अपना सब कुछ होकर परायों के हाथों में ज़िंदगी की डोर होना कैसा होता है। बार बालाओं को बार से निकाले जाने की ख़बरों ने किस तरह इनकी ज़िंदगी में खलबली मचा दी। स्थिति यह हो गई कि डांस बार के मालिक पहले की तुलना में पुलिस को पांच गुना हफ्ता देने को तैयार थे।
एक रात में उड़ाए 80-90 लाख । स्टाम्प पेपर घोटाले के दोषी अब्दुल करीम तेलगी यदि उस रोज डांस बार न जाता, तो शायद उसका करोड़ों-अरबों का घोटाला उजागर न होता। उसके बारे में यह किस्सा मशहूर है कि उसने अपने अहंकार में डूबकर एक ही रात में डांस बार में 80-90 लाख रुपये उड़ा दिए थे। इससे वह पुलिस की नज़र में आ गया और पुलिस ने उसके खिलाफ जांच शुरू कर दी। ऐसे तमाम मालदार लोग बार बालाओं पर लाखों लुटा देते थे। बालाएं भी इन्हें रिझाने और रकम लूटने का कोई मौका नहीं छोड़ती थीं। अब मुंबई के इस कल्चर पर लगभग लगाम लग चुकी है या महंगे होटलों और रेस्तराओं में सख्ती के साथ सब चल रहा है। दूसरी ओर, अधिकतर बार बालाओं ने कमाठीपुरा या ग्रांट रोड का रुख कर लिया, जो कल तक यहां की बदनाम गलियों में बसने वालियों से खुद को बहुत अलग मानती थीं।


