साधना का वास्तविक उद्देश्य है मन और अहंकार से ऊपर उठना। लेकिन, यह आसान भी नहीं। मनुष्य के भीतर भय, संदेह, लज्जा, घृणा, काम, क्रोध, लोभ जैसे बंधन हैं। ये बंधन शत्रु के समान हैं, जिनसे मुक्ति पाना जरूरी है। यदि मन शुद्ध नहीं, तो वह सही दिशा में नहीं जा सकता। इसलिए शरीर, विचार और वातावरण - तीनों की शुद्धता आवश्यक है।
व्यावहारिक जीवन में हम उन लोगों को महान मानते हैं, जो अपने मन को चेतना से जोड़ लेते हैं। इसके विपरीत, जो लोग अपने छोटे-से अहंकार में उलझकर भेदभाव करते हैं, वे समाज पर बोझ बन जाते हैं। महान संतों ने हमेशा इस भेदभाव का विरोध किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मनुष्य की पहचान उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म और चेतना से होती है। जो व्यक्ति हर प्राणी में उसी परम तत्व को देखता है, वही सच्चे अर्थों में श्रेष्ठ है।
आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग भक्ति, ज्ञान और कर्म के संतुलन से बनता है, लेकिन इनमें भी भक्ति का स्थान सर्वोपरि है। यदि प्रेम और समर्पण नहीं, तो ज्ञान और कर्म भी अधूरे रह जाते हैं। सच्ची साधना वही है, जिसमें व्यक्ति अपने अहंकार को त्यागकर उस अनंत सत्ता में पूरी तरह समर्पित हो जाए। यही मुक्ति है, यही जीवन की परम सार्थकता है।
प्रस्तुति : दिव्यचेतनानंद अवधूत


