सुप्रीम कोर्ट का हेट स्पीच से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए कानून बनाने के क्षेत्र में दखल देने से इनकार करना संविधान की भावना के अनुरूप है। भारत की व्यवस्था में शक्तियों का बंटवारा इस तरह किया गया है कि विधायिका कानून बनाएगी और न्यायपालिका उसकी व्याख्या करेगी। हालांकि शीर्ष अदालत के फैसले से अभिव्यक्ति की आजादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन की बहस जरूर फिर उठ खड़ी होती है।
सीमा का सम्मान । इस मामले को दो तरह से देखा जा सकता है। एक, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका की सीमाओं को रेखांकित किया और दूसरा, यह तय करना सरकार पर छोड़ा कि बदलते सामाजिक हालात में हेट स्पीच के मामलों से निपटने के लिए नए कानूनी प्रावधानों की जरूरत है या नहीं। अदालत ने माना कि मौजूदा कानून में ऐसा खालीपन नहीं है, जिसके लिए उसे दखल देना पड़े। यह रुख सुप्रीम कोर्ट के पुराने निर्णयों के अनुरूप है।
बढ़ती समस्या । आज हेट स्पीच का कोई एक दायरा नहीं है। सोशल मीडिया ने शब्दों-तस्वीरों को नई ताकत तो दी है, पर उसके साथ खतरे भी बढ़ाए हैं। डिजिटल प्लैटफॉर्म पर नफरत फैलाने वाले बयान तेजी से फैलते हैं और जब तक उन पर रोक लगाने की कोशिश शुरू होती है, तब तक वे नुकसान कर जाते हैं। फिर राजनेता भी ऐसी बयानबाजी करते आए हैं।
असहमति भी जरूरी । हेट स्पीच और अभिव्यक्ति की आजादी में कई बार बहुत महीन रेखा होती है। 2015 में श्रेया सिंघल बनाम सरकार मामले में ऐसा देखा भी गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने IT एक्ट की धारा 66ए को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। तब कोर्ट ने कहा था कि हर आपत्तिजनक या आक्रामक बयान को हेट स्पीच नहीं माना जा सकता। यह बात आज भी लागू होती है। असहमति या विरोध लोकतंत्र का हिस्सा हैं और इनको सीमित नहीं किया जा सकता। लेकिन, साथ में यह भी याद रखना जरूरी है कि अभिव्यक्ति की आजादी असीमित नहीं हो सकती। इसकी वजह से देश, समाज का नुकसान नहीं होना चाहिए।
समीक्षा और सुधार । सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को यह सोचने का मौका दिया है कि बदलते सामाजिक हालात के अनुसार कानून की समीक्षा की जा सकती है। विधि आयोग की 267वीं रिपोर्ट का जिक्र बताता है कि सुधार की संभावना मौजूद है। इस रिपोर्ट में नफरती भाषण को परिभाषित करने और उन्हें रोकने के लिए कानून में संशोधन की सिफारिश थी। अदालत ने राह दिखा दी है, अब काम सरकार का है।


