लोकतंत्र के लिए चुनौती

नवभारतटाइम्स.कॉम

पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले मालदा की घटना ने कानून व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर चिंता जताई है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर जनता में असंतोष है। नामों के कटने से अविश्वास का माहौल बना है। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट समाधान के प्रयास कर रहे हैं।

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मालदा की घटना और उस पर सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी बताती है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव कानून व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं के लिए परीक्षा बन चुका है। राज्य में 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होनी है। इससे पहले जिस तरह के हालात बने हैं, उसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए बिल्कुल शुभ नहीं माना जा सकता।

SIR पर असंतोष । मालदा के कालियाचक में भीड़ ने 7 न्यायिक अधिकारियों को 9 घंटे तक बंधक बनाकर रखा। घेराव, लगातार विरोध-प्रदर्शन और चक्का जाम जैसी घटनाओं से जाहिर है कि जमीनी स्तर पर लोगों में Special Intensive Revision (SIR) को लेकर गंभीर असंतोष है। हालांकि मालदा में उनके गुस्से ने कानून की सीमा को पार कर दिया, जिसे उचित नहीं ठहराया जा सकता।

प्रशासनिक नाकामी । यह घटना निश्चित तौर पर कानून व्यवस्था की नाकामी का नतीजा है और इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को इतने सख्त शब्दों का इस्तेमाल करना पड़ा। राज्य में हालात लंबे समय से तनावपूर्ण हैं और पहले भी SIR ड्यूटी में लगे कर्मचारियों को असुरक्षित स्थितियों का सामना करना पड़ा है। अगर जिम्मेदार अधिकारी हालात की गंभीरता का अंदाजा नहीं लगा पाए, तो यह उनकी नाकामी है। गौर करने वाली बात है कि चुनावों के ऐलान के बाद राज्य में ऊपर से नीचे तक बड़े पैमाने पर अफसरों के तबादले हुए हैं।

जनता में अविश्वास । इस घटना के बीच जनता की चिंताओं को भी समझने की जरूरत है। बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के पहले लगभग 7.6 करोड़ वोटर थे और अब करीब 10% कम हो गए हैं। फाइनल लिस्ट के बाद 60 लाख को तार्किक विसंगति में चिह्नित किया गया था। इनमें से अब तक 47 लाख आपत्तियों का निपटारा हो चुका है। हालांकि रिजेक्शन रेट बेहद ज्यादा बताया जा रहा है - 35 से 40% तक। लोगों का आरोप है कि उनके नाम काटे जा रहे हैं। इससे अविश्वास का माहौल है।

दलों की भूमिका । चुनाव आयोग ने भरोसा दिलाया है कि कोई भी योग्य मतदाता छूटने नहीं पाएगा। सुप्रीम कोर्ट भी लगातार नजर रखे हुए है और मामले के समाधान के लिए उसने SIR प्रक्रिया में न्यायिक अधिकारियों को लगाकर अभूतपूर्व रास्ता निकाला था। इनके बीच जनता और सरकारी मशीनरी के बीच यकीन कायम होना बेहद जरूरी है। यहां राजनीतिक दलों की भूमिका भी बढ़ जाती है। उन्हें इस मुद्दे पर ज्यादा संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। चुनावी प्रक्रिया पर अगर जनता को संदेह होता है, तो इसमें सभी का नुकसान ही है।