डॉनल्ड ट्रंप ने एक अप्रैल को वाइट हाउस से अमेरिकी जनता को संबोधित किया। यह भाषण सामरिक संदेश लिए भी था और इसके राजनीतिक मायने भी थे। ईरान युद्ध को पांच हफ्ते हो चुके हैं। ऐसे में अपनी स्पीच से ट्रंप ने यह दिखाने का प्रयास किया कि हालात नियंत्रण में हैं। लेकिन, शब्दों के इस खेल के पीछे युद्ध से जुड़ी वही पुरानी चिंता है - विवादित परिणाम, आर्थिक घबराहट और भू-राजनीतिक अनिश्चितता।
श्रेष्ठता का प्रदर्शन । ट्रंप ने भाषण की शुरुआत घरेलू उपलब्धियों से की। इसमें संक्षिप्त रूप से नासा के Artemis II मिशन का जिक्र आया और इसके बाद वह तुरंत युद्ध की चर्चा करने लगे। यह अंदाज ही अपने में बहुत कुछ कहता है - उन्नत अमेरिकी तकनीक और सैन्य क्षमता को सामने रखकर राष्ट्रीय श्रेष्ठता का प्रदर्शन करना। इसके बाद उन्होंने युद्ध में बड़ी सफलता का दावा किया। उनके मुताबिक, कुछ ही हफ्तों में ईरान को अभूतपूर्व नुकसान हुआ है।
पुरानी सोच । ऐसे बड़े-बड़े दावे करना युद्ध के समय में सामान्य है, लेकिन इससे ट्रंप ने संघर्ष को इस तरह से पेश किया, मानो अमेरिका को जैसे जीत मिल रही हो। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि इस भाषण से ट्रंप की पुरानी रणनीतिक सोच जाहिर होती है, जिसके मुताबिक जबरदस्त ताकत इस्तेमाल करके कम समय में ही विपक्षी के व्यवहार को बदला जा सकता है।
नीति का हिस्सा । ट्रंप ने ईरान पर हमले के लिए जो कारण गिनाए, उनके बारे में पहले से पता है - उसका परमाणु कार्यक्रम, अमेरिका और इस्राइल से दुश्मनी और उग्रवादी समूहों को समर्थन देने का इतिहास। इन सबको सभ्यतागत खतरे के रूप में दिखाया गया। ट्रंप ने कासिम सुलेमानी की हत्या और 2015 के परमाणु समझौते से बाहर निकलने जैसे अपने पुराने फैसलों का भी जिक्र किया। इससे उन्होंने मौजूदा युद्ध को तार्किक बताने का प्रयास किया कि यह उसी पुरानी नीति का हिस्सा है।
नैतिकता का चोला । ट्रंप ने युद्ध को जिस नैतिक स्पष्टता के साथ पेश किया, वह भी ध्यान खींचने वाली बात है। ईरान को ऐसे देश के रूप में दिखाया गया, जो आक्रामक है और अस्थिरता फैलाता है। ट्रंप की विदेश नीति की यह पहचान रही है कि वह चीजों को केवल दो पहलू से देखते हैं - अच्छाई बनाम बुराई, व्यवस्था बनाम अराजकता।
दावे का जोखिम । युद्ध की समयसीमा के सवाल पर ट्रंप ने आशावादी रुख अपनाया। कहा कि मुख्य रणनीतिक लक्ष्य पूरे होने वाले हैं और अगले दो-तीन हफ्तों में लड़ाई का सबसे तीव्र दौर खत्म हो सकता है। यह बहुत बड़ा दावा है, खासकर ईरान की क्षमताओं को देखते हुए। उनका कहना कि 'हमारे पास सभी पत्ते हैं' राजनीतिक रूप से ठीक हो सकता है, लेकिन वह ईरान को कम करके आंक रहे हैं।
चिंताएं नजरअंदाज । ट्रंप ने युद्ध के आर्थिक पहलू पर संभलकर बात की। अमेरिका में तेल-गैस की कीमतें राजनीतिक रूप से संवेदनशील रही हैं। ट्रंप ने माना तो कि ये महंगी हुई हैं, पर यह भी कहा कि होर्मुज स्ट्रेट में ईरान की वजह से अस्थायी समस्या है। अमेरिका की तेल-गैस पर आत्मनिर्भरता पर जोर असल में अमेरिकियों को भरोसा दिलाने के लिए था। लेकिन, यह बात नजरअंदाज हो गई कि ग्लोबल एनर्जी मार्केट एक-दूसरे से जुड़ा है। अमेरिकी इकॉनमी संकट से कितनी भी अछूती हो, लेकिन होर्मुज का कुछ असर पड़ेगा ही।
भू-राजनीतिक असर । जितना कहा जा रहा है, इस युद्ध का आर्थिक असर उससे ज्यादा होगा। युद्ध की वजह से एनर्जी की बढ़ती कीमतें, महंगाई और वैश्विक आर्थिक सुस्ती केवल थोड़े समय की परेशानी नहीं है। अमेरिका के सहयोगियों, खासकर यूरोप और एशिया के देशों के लिए इसकी कीमत ज्यादा हो सकती है। भू-राजनीतिक नजरिए से देखें तो अमेरिका, इस्राइल और खाड़ी देशों के बीच सहयोग बढ़ रहा है, लेकिन कुछ सहयोगियों का पूरी तरह से समर्थन में उतरने से हिचकना बताता है कि मतभेद भी हैं। वहीं, चीन और रूस जैसे देश इस लड़ाई को मौके रूप में देख रहे हैं।
अनुमान और परिणाम । ट्रंप का भाषण हकीकत का आकलन और इरादों का ऐलान था। इसमें भरोसा, दबदबा और युद्ध जल्द खत्म करने का वादा किया गया। हालांकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अनुमान और परिणाम में अंतर बना रहता है। युद्ध अनुमान के मुताबिक नहीं चलते। आने वाले हफ्ते बताएंगे कि यह अंत की शुरुआत है या फिर संघर्ष का बस अगला चरण।
(लेखक लंदन के किंग्स कॉलेज में प्रफेसर हैं)




