दूसरों में दोष देखेंगे तो मायूसी से भर जाएगा जीवन

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जीवन में खुशहाली के लिए दूसरों में अच्छाई देखें। मधुमक्खियों से सीखें जो फूल से रस लेती हैं पर उसे नुकसान नहीं पहुंचातीं। दूसरों की प्रशंसा करने से मित्र बढ़ते हैं और सकारात्मक माहौल बनता है। दोष ढूंढने वालों को कम लोग पसंद करते हैं और उनके शत्रु बढ़ते हैं। आलोचना से पहले आत्म-निरीक्षण करें।

finding faults in others fills life with disappointment seek goodness

दूसरों में कमियां ढूंढना मनुष्य का स्वभाव है। जैसे ही कोई गलती करता है, लोग उसके पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं। लेकिन, यही काम अपने लिए नहीं कर पाते। इस मामले में मधुमक्खियों से हम सीख सकते हैं, जो रस चूसने के लिए एक फूल से दूसरे फूल पर जाती हैं, लेकिन पहले वाले फूल को नुकसान नहीं पहुंचाती। जबकि हममें से कई ऐसे हैं, जब एक घर छोड़कर दूसरे घर में जाते हैं, तो पहले की बुराई करने लगते हैं। एक कंपनी से दूसरी कंपनी में जाते हैं, तो पहली की बुराई करने लगते हैं। मनुष्य को भी मधुमक्खियों की तरह दूसरों में हमेशा अच्छाई ढूंढने का प्रयास करना चाहिए।

प्रत्येक व्यक्ति के अंदर कोई-न-कोई अच्छाई अवश्य होती है और अच्छे लोग उसका सार्वजनिक रूप से बखान भी करते हैं। दूसरों में हमेशा अच्छाई ढूंढने या दूसरों की प्रशंसा करने के तीन बड़े और प्रामाणिक लाभ भी हैं। पहला, हम जिसमें अच्छाई तलाशते हैं, उसके भीतर की रही-सही बुराइयां भी समाप्त होती जाती हैं। दूसरा, हमारे मित्रों व हितैषियों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती है। तीसरा लाभ यह होता है कि हमारे आस-पास सदा सकारात्मक और सुखद परिवेश बना रहता है।

इसके विपरीत, जो लोग दूसरों में दोष , कमियां और बुराइयां ढूंढते हैं, उन्हें जीवन में तीन प्रकार की परेशानियां झेलनी पड़ती हैं। पहली, उन्हें बहुत कम लोग पसंद करते हैं। दूसरी यह कि उनके शत्रुओं और विरोधियों की संख्या में लगातार वृद्धि होती है। तीसरी परेशानी यह उठानी पड़ती है कि उनके आस-पास सदा नकारात्मक, दुखद और मायूसी भरा माहौल रहता है। दूसरों में दोष और कमियां ढूंढने से बचने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि किसी की आलोचना करने से पहले खुद को देखें। ईमानदारी से आत्म-निरीक्षण करें तो पाएंगे कि हमारे मन में बहुत मैल है और आत्मा दागदार। घृणा, द्वेष, हिंसा, प्रतिशोध, वासना, लालच, अहंकार, क्रोध, झूठ बोलना आदि हमारे व्यक्तित्व और चरित्र का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। इनसे बाहर निकलने की शुरूआत आत्म-निरीक्षण से ही हो सकती है।