NBT रिपोर्ट: भारत का ग्रुप हेल्थ इंश्योरेंस (कंपनियों द्वारा कर्मचारियों को दिया जाने वाला बीमा) बाजार अब बदल रहा है। पहले सभी कर्मचारियों के लिए एक जैसी पॉलिसी होती थी। लेकिन अब कंपनियां ऐसी पॉलिसी ला रही हैं जो लचीली हैं और 'पॉइंट्स' पर आधारित हैं। इसका मतलब है कि कर्मचारी अपनी जरूरत के हिसाब से बीमा चुन सकते हैं। यह बदलाव उन युवा कर्मचारियों की वजह से आ रहा है जो बनी-बनाई पॉलिसी के बजाय अपनी पसंद और जरूरत को ज्यादा महत्व देते हैं।
बीमा कंपनियां अब ऐसी पॉलिसी डिजाइन कर रही हैं जिसमें कर्मचारी खुद तय कर सकें कि उन्हें क्या चाहिए। जैसे दांतों और आंखों का इलाज, मानसिक स्वास्थ्य की सुविधा और यहां तक कि पालतू जानवरों का बीमा भी।
प्रूडेंट इंश्योरेंस ब्रोकर्स के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर पवंजित सिंह ढींगरा का कहना है कि लोग अक्सर 'पर्सनलाइजेशन' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यह उससे अलग है। यहां कर्मचारियों को कुछ पॉइंट्स दिए जाते हैं और वे तय नियमों के दायरे में रहकर अपनी पसंद के फायदे चुन सकते हैं। इस मॉडल के तहत, अगर कोई कंपनी हर कर्मचारी के लिए 15,000 रुपये का बजट रखती है, तो उस रकम को पॉइंट्स में बदल दिया जाता है।
ET के मुताबिक, कर्मचारी इन पॉइंट्स का इस्तेमाल कई तरह से कर सकते हैं। जैसे ज्यादा बीमा राशि लेना, मैटरनिटी की सीमा बढ़ाना या दांतों, आंखों के इलाज। गंभीर बीमारी और पालतू जानवरों के बीमा जैसे ऐक्स्ट्रा कवर चुनना। यह तरीका पुराने 'टॉप-अप' से काफी अलग है। ढींगरा का कहना है कि इसमें कर्मचारियों की भागीदारी बहुत ज्यादा है। करीब 60-70% कर्मचारी खुद अपनी पसंद के विकल्प चुनते हैं। हालांकि, अभी यह कुल प्रीमियम का सिर्फ 5% ही है। क्योंकि इसे चलाने के लिए बेहतर डेटा, तकनीक और बारीकी से नजर रखने की जरूरत होती है ताकि क्लेम का खर्च बहुत ज्यादा न बढ़ जाए। शहरों में मानसिक स्वास्थ्य, वेलनेस सेवाओं और पालतू जानवरों के बीमा जैसी खास चीजों की मांग बढ़ रही है।




