गर्भ में ही बच्चों के दिल को बीमार कर रहा प्रदूषण

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शहर में प्रदूषण और धूम्रपान का असर अब कोख में पल रहे बच्चों पर पड़ रहा है। इससे जन्मजात दिल की बीमारी (सीएचडी) के मामले बढ़ रहे हैं। मार्च 2025 से मार्च 2026 के बीच 35 बच्चों की सर्जरी हुई। डॉक्टर्स के अनुसार, तंबाकू, धूम्रपान और प्रदूषण इसके मुख्य कारण हैं। समय पर पहचान और इलाज जरूरी है।

pollution threatens hearts of unborn babies rise in congenital heart disease cases

n दीपाली श्रीवास्तव, गुड़गांव

शहर और आसपास के इलाकों में मां की कोख अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं रह गई है। प्रदूषण और धूम्रपान का बढ़ता प्रभाव गर्भ में पल रहे शिशुओं के दिल पर सीधा असर डाल रहा है। जिसका नतीजा कॉनजेनाइटल हार्ट डिजीज (CHD) यानी जन्मजात दिल की बीमारी के मामले में सामने आ रहा है।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2025 से मार्च 2026 के बीच जिले में सीएचडी के 35 बच्चों की सर्जरी की गई, जबकि 15 मामलों का इलाज किया गया। ये आंकड़े केवल सरकारी हैं। निजी अस्पताल और कई अनरजिस्टर्ड मामलों को शामिल किया जाए तो स्थिति इससे कहीं ज्यादा चिंताजनक हो सकती है। डॉक्टर्स के मुताबिक, गर्भावस्था के दौरान मां के शरीर पर पड़ने वाले पर्यावरणीय और जीवनशैली से जुड़े प्रभाव सीधे भ्रूण के दिल के विकास को प्रभावित कर रहे हैं। डायरेक्टर कार्डियोलॉजी डॉ. संजय चुघ के अनुसार, सीएचडी के करीब एक तिहाई मामलों में तंबाकू, धूम्रपान, अल्कोहल और पर्यावरणीय प्रदूषण प्रमुख कारण हैं। धुएं और प्रदूषण में मौजूद हानिकारक तत्व भ्रूण के दिल के विकास को प्रभावित करते हैं, जिससे जन्म के समय दिल में छेद या अन्य विकृतियां देखने को मिलती हैं।

सीएचडी जन्म से जुड़ी दिल की बीमारी है, जिसमें बच्चे के दिल की बनावट या कार्य में गड़बड़ी होती है। इसमें दिल में छेद, वाल्व की खराबी या खून के प्रवाह में रुकावट जैसी समस्याएं शामिल हैं। समय पर पहचान और इलाज से इसे नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन लापरवाही गंभीर खतरा बन सकती है। डॉक्टर्स के अनुसार अगर बच्चे को सांस लेने में तकलीफ होने लगे, दूध पीने में कमजोरी महसूस होती हो, बिना किसी कारण शरीर या होंठ नीले पड़ जाएं या दूध पीने के बावजूद सही से वजन न बढ़े तो यह लक्षण हो सकते हैं।