अभी-नेता!

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Navbharat Times

मोबाइल पर कुछ तो देख रहे थे डायरेक्टर साहब कि उनकी नजर कुछ महीने पुरानी एक रील पर पड़ गई। पांच-सात मिनट की इस रील में एक युवा नेता अपना चुनाव प्रचार करते दिख रहे थे। डायरेक्टर साहब इस रील पर ठहर गए। एक बार देखी, दो बार देखी, तीन बार देखी...। पता नहीं कितनी बार देखी। इतना शानदार अभिनय। ऐसी रियलिस्टिक एप्रोच। एक पल में आंसू बहा देना और दूसरे ही पल कुटिलता से हंसते हुए खींसें निपोर लेना। ऐसी विनम्रता दिखाना कि वोटर तत्काल वश में हो जाएं। अगर लगे कि वश में नहीं हो पा रहे, तो इतनी बारीकी से धमका देना कि उनकी किसी और उम्मीदवार के लिए बटन दबाने की जुर्रत न हो। गजब की अदाकारी। कमाल की कारीगरी। आज का बड़े से बड़ा ऐक्टर इस युवा नेता के सामने फेल! इसके बाद तो डायरेक्टर साहब ने इस युवा नेता को फॉलो करना शुरू कर दिया। कभी किसी टीवी डिबेट में देखा। कभी किसी जलसे में पाया। भई, जलवा है जलवा। डायरेक्टर साहब हर बार बुदबुदाए- यह नेतागीरी क्यों कर रहा है? इसे तो अभिनय के क्षेत्र में होना चाहिए। नेता नहीं, असाधारण अभिनेता है यह। फिल्मों में आ गया, तो झंडे गाड़ देगा। आग लगा देगा आग!!

डायरेक्टर साहब को जैसे फितूर ही सवार हो गया कि अपनी अगली फिल्म में इस नेता से अभिनय कराएंगे! लेकिन इसके लिए नेता जी से मुलाकात और बात जरूरी है, सो मिलने का दिन भी तय हो गया। नेता जी जानते थे कि वह ऐरे-गैरे नहीं, नैशनल अवॉर्ड विनर डायरेक्टर हैं। उन्होंने बड़े गौर से सुना डायरेक्टर साहब का प्रस्ताव। प्रस्ताव सुनकर नेता जी की हंसी छूट गई। देर तक हंसने के बाद उन्होंने बस इतना ही कहा- डायरेक्टर साहब, काहे उल्टी गंगा बहाने की सोच रहे हैं? इधर, ट्रेंड तो यह चल रहा है कि पहले अभिनेता बनो। फैन कमाओ। स्टार बन जाओ। उसके बाद संसद में जाने से कोई नहीं रोक सकता। आपको अभिनेता से नेता बने कितने नाम गिनाऊं? जब अभिनेता को आखिर में नेता बनना है, तो फिर मैं क्या बुरा हूं?