तकरार बन रही जानलेवा

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Navbharat Times

n NBT रिपोर्ट, नई दिल्ली

बढ़ती आबादी, सीमित जगह और बदलती लाइफस्टाइल के बीच पार्किंग अब सिर्फ गाड़ी खड़ी करने का मसला नहीं, बल्कि सामाजिक तनाव का बड़ा कारण बन गया है। दिल्ली में मामूली कहासुनी हिंसा, फायरिंग और हत्या तक पहुंच रही है। कानून के विशेषज्ञ मानते हैं कि यह केवल जगह की कमी नहीं, बल्कि घटती सहनशीलता, कानून का डर कम होना और ‘मेरी जगह’ वाली मानसिकता का नतीजा है। दिल्ली पुलिस के मुताबिक, बीते साल पार्किंग विवाद से जुड़े 7 हजार से ज्यादा कॉल मिलीं।

पूर्व डीसीपी और दिल्ली हाई कोर्ट के एडवोकेट एल.एन. राव के मुताबिक, पहले समाज में बीच-बचाव की परंपरा थी, जिससे झगड़े थाने तक नहीं पहुंचते थे। लेकिन अब लोग हस्तक्षेप करने से बचते हैं। पुरानी कॉलोनियों में जगह सीमित है, जबकि गाड़ियों की संख्या तेजी से बढ़ी है। फ्लैट सिस्टम में एक परिवार के पास कई गाड़ियां हैं, लेकिन पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। ऐसे में विवाद बढ़ना तय है। वहीं, लोगों में सहनशीलता घट रही है, ‘मैं ही सही’ वाली सोच हावी है। तनावपूर्ण जीवनशैली के कारण गुस्से पर नियंत्रण कम हो रहा है। कानून का डर कम हो गया है और सार्वजनिक जगह को निजी संपत्ति समझने की मानसिकता बढ़ रही है। सरकार को ऐसी जगह चिह्नित कर वहां मल्टीलेवल पार्किंग की व्यवस्था करवानी चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि संयम, संवाद और कानून का डर ना हो तो पार्किंग जैसे छोटे विवाद आगे भी बड़े हादसों में बदलते रहेंगे। उनका कहना है कि विदेशों में सड़कों पर पुलिस कम दिखती है, लेकिन कानून का डर इतना होता है कि लोग नियम तोड़ने से बचते हैं। यहां स्थिति उलट है।