Heavy Penalty By Banks On Minimum Balance Looting The Common Mans Pocket
अपने पैसे पर पेनल्टी
नवभारतटाइम्स.कॉम•
आम लोगों की जिंदगी में बैंकिंग एक जरूरी सेवा है, लग्जरी नहीं। जब भारत डिजिटल इकॉनमी की ओर बढ़ना चाहता है, तब बैंक खातों में मिनिमम बैलेंस न बनाए रखने पर जुर्माना वसूला जा रहा है। ये ठीक है कि बैंकिंग सेवाओं के लिए भारी तकनीकी खर्च होता है। लेकिन आम लोगों को बैंकों से जोड़ने का मतलब केवल खाते खोलना नहीं है। ये देखना होगा कि हर नागरिक बिना किसी जुर्माने के डर के इनकी सेवाओं का उपयोग कर सके। जब किसी व्यक्ति के खाते में न्यूनतम राशि से कम पैसे होते हैं, तो मुमकिन है कि वह पहले से ही आर्थिक तंगी में हो। ऐसे में उसके बचे हुए पैसों से भी लो-बैलेंस का जुर्माना काट लेना उसे और संकट में डालता है।
मिनिमम बैलेंस न रखने पर जुर्माना लगाने में प्राइवेट सेक्टर के बैंक सरकारी से काफी हैं। बैंकों ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में जुर्माने के रूप में लगभग 7,100 करोड़ रुपये इकट्ठा किए हैं, जो इससे पिछले वर्ष के लगभग 6,800 करोड़ से अधिक है। इस वसूली का लगभग 70% हिस्सा अकेले प्राइवेट बैंक ों द्वारा वसूला गया है। वैसे तो 12 में से 10 सरकारी बैंकों ने सेविंग खातों में मिनिमम बैलेंस न रखने पर लगने वाले जुर्माने को पूरी तरह खत्म कर दिया है। कम लोगों को पता होता है कि वे बेसिक सेविंग्स बैंक डिपॉजिट अकाउंट का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो मिनिमम बैलेंस न रखने पर जुर्माने से पूरी तरह मुक्त हैं। अक्सर बैंक में ग्राहकों को इसके लिए हतोत्साहित किया जाता है। वेतन से जुड़ा खाता अक्सर जीरो बैलेंस होता है। कई प्राइवेट बैंक पूरी तरह से ऑनलाइन सेविंग खातों पर कोई चार्ज नहीं लगाते। प्रधानमंत्री जन धन योजना के तहत खुले खातों पर मिनिमम बैलेंस का कोई नियम लागू नहीं होता।बैंकों की ओर से पेनल्टी का नियम ग्राहकों को वित्तीय अनुशासन सिखाने के लिए भी किया जाता है। बैंक चाहते हैं कि उनके पास एक निश्चित मात्रा में नकदी जमा रहे, जिससे वे लोन दे सकें और उनका कारोबार चलता रहे। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार, बैंकों को मिनिमम बैलेंस न रखने पर जुर्माना लगाने की इजाजत तो है, लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें जरूरी हैं। कोई भी जुर्माना लगाने से पहले ग्राहकों को SMS, ईमेल आदि से सूचित करना जरूरी है। ग्राहकों को अपने खाते में न्यूनतम राशि वापस बनाए रखने के लिए पर्याप्त समय भी दिया जाना चाहिए। डेबिट कार्ड मेंटिनेंस चार्ज भी बैंकों में लगातार बढ़ रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी बैंकों में ही यह पिछले पांच वर्षों में लगभग 90% बढ़ गया है।