Transparency In Temples Problems Solved By Shastrarth based Management
मंदिरों को चाहिए पारदर्शी व्यवस्था
नवभारतटाइम्स.कॉम•
अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दानपात्रों से कथित चोरी का मामला इन दिनों चर्चा में है। इसी बीच, केरल हाईकोर्ट ने सबरीमला मंदिर में 4.5 किलो सोने के कथित दुरुपयोग के मामले में FIR दर्ज करने की अनुमति दी है। वहीं, उत्तराखंड के बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर में भी नकदी और बेशकीमती चीजों की कथित चोरी के आरोपों की जांच चल रही है।
कॉरपोरेट मॉडल समाधान । इन घटनाओं से तीखी बहस छिड़ गई है। एक पक्ष का कहना है कि बड़े हिंदू मंदिरों का प्रबंधन सरकार के अधीन लाया जाए, उनके लिए धार्मिक कॉरपोरेशन बनाए जाएं या स्वतंत्र निदेशकों वाला कॉरपोरेट मॉडल बने। दूसरा पक्ष केवल हिंदू मंदिरों को निशाना बनाए जाने पर प्रश्न उठाता है। वह अन्य धर्मों के धार्मिक संस्थानों में भ्रष्टाचार, भूमि घोटालों और धन के कथित दुरुपयोग के मामलों को भी सामने लाने की बात करता है। इन सुझावों की अपनी सीमाएं हैं। सनातन में ही है उपाय । मुझे लगता है कि सनातन परंपरा पर आधारित पारदर्शी और सहभागी मंदिर प्रबंधन मॉडल बनाया जाए। सनातन संस्कृति में शास्त्रार्थ के रूप में संवाद, तर्क-वितर्क, विचार-विमर्श और सर्वसम्मति से निर्णय लेने की एक प्राचीन और सहभागी व्यवस्था रही है। शताब्दियों तक मंदिरों और अन्य हिंदू धार्मिक संस्थानों में शास्त्रार्थ (चर्चा और विमर्श) के माध्यम से प्रश्न पूछने, समीक्षा करने की खुली परंपरा रही। इसी परंपरा ने दक्षिण भारत के युवा संन्यासी आदि शंकराचार्य को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के विद्वानों और दार्शनिकों के साथ शास्त्रार्थ और धार्मिक सुधारों का मार्ग प्रशस्त करने में सक्षम बनाया। उन्होंने मठों, मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थानों के प्रबंधन की सुदृढ़ व्यवस्था विकसित की। बाद में स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी इसी रास्ते पर चलकर आधुनिक भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक सुधारों को नई दिशा दी।
असहमति की गुंजाइश घटी । आज भारत के अनेक मंदिरों का प्रबंधन एक व्यक्ति, एक परिवार या सीमित समूह के हाथों में सिमट गया है। इससे सवाल उठाने, निर्णयों की समीक्षा करने, रचनात्मक असहमति जताने की गुंजाइश कम हो गई है। कई बार तो प्रश्न उठाने वालों की आवाज दबा दी जाती है। अधिकारों का यह केंद्रीकरण जवाबदेही को कमजोर करता है और अनियंत्रित स्वार्थ को बढ़ाता है।
ऐसे लागू हो मॉडल । मेरा मानना है कि मंदिर प्रबंधन की इन कमियों का समाधान शास्त्रार्थ के सिद्धांतों पर आधारित व्यवस्था से किया जा सकता है। हरेक पंजीकृत मंदिर में एक ‘शास्त्रार्थ परिषद’ का गठन किया जाना चाहिए। इसके लिए मंदिर के पंजीकरण दस्तावेज में शास्त्रार्थ परिषद का गठन अनिवार्य किया जाए। साथ ही, यह व्यवस्था हो कि श्रद्धालुओं के प्रतिनिधि संगठन के अनुरोध पर तय समय-सीमा के भीतर शास्त्रार्थ आयोजित करना अनिवार्य हो। मंदिर न्यास/प्रबंधन समिति जिन विषयों पर सर्वसम्मति से निर्णय न ले सके, उन्हें शास्त्रार्थ परिषद के पास भेजा जाए।
युवा तैयार होंगे । चूंकि शास्त्रार्थ सनातन संस्कृति की अनादि परंपरा का अभिन्न अंग रहा है, इसलिए पुजारियों और मंदिर प्रबंधन के पास इस व्यवस्था का विरोध करने का कोई नैतिक आधार नहीं होगा और इसे लागू करना सहज होगा। ऋग्वेद के सिद्धांत, जैसे ‘सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएं’ (ऋग्वेद 1.89.1), ‘प्रत्येक विचार और दावे की प्रमाण और तर्क के आधार पर समीक्षा हो’ (ऋग्वेद 10.71.2), तथा ‘जो लोग प्रश्न और संवाद के प्रति ग्रहणशील नहीं होते, वे समाज के लिए अहितकारी होते हैं’ (ऋग्वेद 8.101.4) के अनुरूप यदि इसकी कार्यप्रणाली होगी तो मंदिर प्रबंधन व्यवस्था के भीतर ही आत्मशुद्धि का एक प्रभावी तंत्र विकसित हो जाएगा। ऐसी व्यवस्था में बाहरी नियंत्रण की आवश्यकता कम होगी। इसके जरिए दान प्रबंधन, श्रद्धालुओं को सुविधाएं, भीड़ प्रबंधन, भाई-भतीजावाद, स्वच्छता, एकाधिकार की प्रवृत्ति और अन्य प्रबंधन संबंधी समस्याओं के स्थायी समाधान मिल सकते हैं। यह युवाओं को मंदिरों के बेहतर प्रबंधन के लिए तैयार करेगी।
बाहरी दखल से बचें । सरकारी प्रतिनिधियों की नियुक्ति कर, कानून बनाकर मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण करने से बाहरी हस्तक्षेप बढ़ेगा। सरकार बदलेगी तो व्यवस्था की दिशा और प्राथमिकताएं भी बदल जाएंगी। सनातन धर्म की मंदिर परंपरा का मूल आधार बाहरी नियंत्रण नहीं, बल्कि आंतरिक उत्तरदायित्व, शास्त्रसम्मत विचार-विमर्श और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया यानी शास्त्रार्थ रहा है।
(लेखक ने ‘शास्त्रार्थ इन इंडिया: मेथोडोलॉजी एंड एप्लिकेशंस’ नाम की किताब लिखी है)