केवल वैवाहिक विवाद आत्महत्या के लिए उकसाने का आधार नहीं : HC

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marital dispute not a basis for abetting suicide allahabad high court
nNBT न्यूज, लखनऊ : इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दहेज उत्पीड़न और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में दोषी ठहराए गए पति को बरी कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि जब आत्महत्या से पांच माह 12 दिन पहले से पति-पत्नी के बीच कोई संपर्क या संवाद ही नहीं था, तो यह नहीं कहा जा सकता कि पति ने पत्नी को आत्महत्या के लिए उकसाया। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने अंकुर टंडन की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला और सजा निरस्त कर दी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपित को आईपीसी की धारा 498-ए, 306 तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत दोषी ठहराया था, जबकि धारा 304-बी (दहेज हत्या) से बरी कर दिया था।

मामले के अनुसार, मृतका का विवाह 14 दिसंबर 2004 को हुआ था। आरोप था कि पति और उसके परिवार ने फ्लैट खरीदने के लिए 10 लाख रुपये दहेज की मांग की। मृतका के पिता ने जमीन बेचकर छह लाख रुपये देने का दावा किया था, लेकिन शेष चार लाख रुपये के लिए प्रताड़ना जारी रहने का आरोप लगाया गया। महिला ने दो अक्टूबर 2010 को आत्महत्या कर ली थी। हाई कोर्ट ने पाया कि छह लाख रुपये दहेज दिए जाने संबंधी अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर विरोधाभास हैं। गवाहों के बयानों में अंतर था और जमीन बेचने की तारीख व बिक्री राशि का भी स्पष्ट विवरण नहीं दिया गया। कोर्ट ने कहा कि दहेज प्रतिषेध अधिनियम के तहत दहेज देना और लेना दोनों अपराध हैं, लेकिन इस मामले में दहेज दिए जाने का आरोप संदेह से परे सिद्ध नहीं हुआ।
जुर्माना वापस करने का निर्देश

आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप पर अदालत ने कहा कि केवल वैवाहिक संबंधों में तनाव या विवाद पर्याप्त नहीं है। इसके लिए आरोपित द्वारा आत्महत्या से निकट समय में ऐसा सकारात्मक कृत्य, प्रोत्साहन या सहायता साबित होना आवश्यक है, जिससे पीड़िता आत्महत्या के लिए विवश हुई हो। ठोस साक्ष्यों के अभाव में साक्ष्य अधिनियम की धारा 113-ए के तहत भी उकसावे की धारणा नहीं बनाई जा सकती। अभियोजन आरोप सिद्ध करने में विफल रहा, इसलिए अदालत ने आरोपित को सभी आरोपों से बरी करते हुए जमा जुर्माना वापस करने का भी निर्देश दिया।