Youth Dominance In Corporate Indias Boardrooms Number Of Directors Under 40 Tripled
कॉरपोरेट इंडिया के बोर्डरूम में युवाओं का दबदबा
नवभारत टाइम्स•
(फोटो- नवभारत टाइम्स)
NBT रिपोर्ट, नई दिल्ली:
कॉरपोरेट इंडिया के बोर्डरूम अब जवान हो रहे हैं। लेकिन देश की बड़ी लिस्टेड कंपनियां अब भी इस मामले में पीछे हैं। Primeinfobase.com के आंकड़ों के मुताबिक, नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) में लिस्टेड कंपनियों के डायरेक्टरों की औसत उम्र 4 अगस्त तक कम होकर 56.54 साल पर आ गई है। 10 साल पहले (31 मार्च, 2017 तक) यह उम्र 58.92 साल थी। वहीं, बोर्ड में 40 साल से कम उम्र के लोगों की सीटों की संख्या भी तीन गुना से ज्यादा बढ़ गई है।हालांकि, निफ्टी 100 और निफ्टी 500 कंपनियों के बोर्ड में शामिल लोगों की उम्र थोड़ी बढ़ी है। 4 अगस्त तक इनकी औसत उम्र क्रमशः 61.28 साल और 60.5 साल रही। इससे पता चलता है कि बड़ी कंपनियां अब भी ज्यादा अनुभवी डायरेक्टरों को ही तरजीह दे रही हैं।
4 अगस्त तक सभी 3,003 NSE लिस्टेड कंपनियों में 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों के पास 2,261 सीटें थीं। 31 मार्च, 2017 तक 1,577 कंपनियों में यह संख्या 750 थी। बदलाव इंडिपेंडेंट डायरेक्टरों के मामले में और भी ज्यादा साफ दिखता है। NSE की कंपनियों में 40 साल से कम उम्र के इंडिपेंडेंट डायरेक्टरों की संख्या 230 (31 मार्च 2017) से चार गुना से ज्यादा बढ़कर 1,040 (4 अगस्त तक) हो गई है।
कुल मिलाकर, NSE कंपनियों में 40 साल से कम उम्र के डायरेक्टरों की हिस्सेदारी अब 10% से ज्यादा हो गई है, जो एक दशक पहले 6% थी। इसी तरह 45 साल से कम उम्र वालों की हिस्सेदारी 11% से बढ़कर करीब 17% हो गई है।
निफ्टी 100 कंपनियों में 40 साल से कम उम्र के सिर्फ 19 डायरेक्टर हैं, जो कुल 959 सीटों का करीब 2% है। 10 साल पहले 1,082 में से ऐसी सिर्फ 12 सीटें (1.1%) थीं।
अंतर की वजह?
ग्लोबल कंसल्टेंसी शेफील्ड हॉवर्थ की चेयरपर्सन और इंडिया हेड मोनिका अग्रवाल ने ET को बताया कि यह भारतीय कंपनियों के अनुभव के स्तर को दिखाता है। उन्होंने कहा, निफ्टी 100 और 500 काफी पुरानी और जमी-जमाई कंपनियां हैं, इसलिए उनके बोर्ड में ज्यादा अनुभवी लोग हैं। वहीं, नए जमाने की कंपनियां ऐसे बोर्ड मेंबर्स की तलाश में रहती हैं जो AI, टेक्नॉलजी, मार्केटिंग और डिजिटल जैसे खास क्षेत्रों में नई सोच के साथ मदद कर सकें। प्राइम डेटाबेस ग्रुप के एमडी प्रणव हल्दिया का कहना है कि यह अंतर मुख्य रूप से कंपनियों के ढांचे की वजह से है।