Ladoos Sad Due To Election Results Hopes Of Victory Also Became Round
लड्डू उदास हैं
नवभारतटाइम्स.कॉम•
लड्डू उदास हैं, क्योंकि वे अब तक बचे हुए हैं। जहां तक दुनिया की रीत है, बचने पर तो खुशियां मनाई जाती हैं, लेकिन यहां भारी दुख हो रहा। लड्डुओं के साथ पहली बार ऐसा हुआ है कि उन्हें कोई खाने वाला नहीं मिल रहा। हर लड्डू को पूरा भरोसा था कि उसका भविष्य उज्ज्वल है। उसे किसी के मुंह में जाना है, फिर फोटो में आना है और सोशल मीडिया पर वायरल हो जाना है। लेकिन, चुनाव के नतीजे आए, तो उम्मीदें लड्डुओं से भी ज्यादा गोल निकलीं और एकदम ही गुल हो गईं।
क्या करें कि जीत अभी आई भी नहीं थी, लेकिन लड्डू पहले आ गए थे। शुद्ध देशी घी में नहाए। विभिन्न मेवों से सजे। रस से भरे। कितने प्रफुल्लित थे वे। चुनाव का नतीजा आने से पहले ही सैकड़ों किलो बन चुके थे। आदेश था, लड्डू ऐसे हों कि जीत छोटी पड़ जाए। किसी के भी मन में नहीं आया था कि खुदा न खास्ता अगर हार गले पड़ गई तो? हार तो नेता जी रोज ही गले में डलवाते हैं, लेकिन यह वाली हार...! कोई सोच भी नहीं सकता था। इसीलिए जीत पर किसी ने भी संदेह नहीं किया। नेता जी की जीत पर संदेह करना देशद्रोह जितना ही गंभीर अपराध था। सो, कड़ाहियां चढ़ीं, बेसन भुना, घी पिघला और गोल-गोल लड्डू निकलते चले गए। लेकिन, इस लोकतंत्र का क्या करें? कैसी तो पलटी मारी। कैसी तो खेली कलाबाजी। लड्डुओं को पहली बार एहसास हुआ है कि वे मिठाई कम और राजनीति ज्यादा हैं।कुल मिलाकर हार बड़ी बन गई और जीत जीरो हो गई। छोटे-बड़े सैकड़ों डिब्बों में बंद लड्डू बेचारे जिस कोने में पड़े थे, अब तक वहीं हैं। रिजल्ट से नेता जी से ज्यादा लड्डुओं को सदमा लगा है। वे समझ गए हैं कि लोकतंत्र में सिर्फ उम्मीदवार ही नहीं हारते, कभी-कभी उम्मीदें भी हारती हैं। और वे अब भी इंतजार कर रहे हैं- किसी विजेता का नहीं, भूखे नागरिक का। जो उन्हें खाए और धन्य हो जाए।