Organ Donation Portal Will It Bring New Hope To The Needy And Change The Face Of Transplantation
अंगदान की जानकारी एक जगह, बदलेगी सूरत?
नवभारतटाइम्स.कॉम•
केंद्र सरकार ने नैशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन ( NOTTO ) का रियल-टाइम ऑर्गन ट्रांसप्लांट पोर्टल शुरू किया है। इससे देशभर की साझा वेटिंग लिस्ट, अंग मिलने की पारदर्शी व्यवस्था, आधार से सत्यापित अंगदान और मरीजों की निगरानी जैसी सुविधाएं मिलेंगी। इससे जरूरतमंदों को मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, ट्रांसप्लांट बढ़ने के बावजूद देश में अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
रेकॉर्ड संख्या, पर पीछे । देश में पिछले साल पहली बार ऑर्गन ट्रांसप्लांट की संख्या 20 हजार के पार पहुंची। 2025 में कुल 20,138 ट्रांसप्लांट हुए, जो 2024 के मुकाबले 6.5% अधिक हैं। ट्रांसप्लांट की संख्या के लिहाज से भारत अब अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में तीसरे नंबर पर है। लेकिन, मृत डोनर से मिलने वाले अंगों की कमी भी हमारे यहां बड़ी चुनौती बनी है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने 3 अगस्त को 16वें भारतीय अंगदान दिवस के मौके पर ‘जुग जुग जियो अभियान’ शुरू किया है। इसके साथ डोनर रजिस्ट्रेशन, प्रतीक्षा सूची और अंग आवंटन के लिए ई-प्रत्यारोपण और NOTTO मोबाइल ऐप जैसी सुविधाएं शुरू की गई हैं। 2023 में नैशनल डिजिटल प्लेज पोर्टल शुरू होने के बाद पांच लाख से ज्यादा लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया था। समान सुविधा नहीं । Lancet की एक स्टडी के मुताबिक, 2021 में भारत में करीब 3.9 लाख किडनी, लिवर, हार्ट और लंग ट्रांसप्लांट की जरूरत थी, जो 2040 तक बढ़कर 4.63 लाख सालाना हो सकती है। ट्रांसप्लांट की सुविधा भी देश में समान नहीं है। 80 से 95% ट्रांसप्लांट सिर्फ महाराष्ट्र, तमिलनाडु, दिल्ली-एनसीआर, केरल और तेलंगाना जैसे पांच राज्यों में ही होते हैं, जबकि यहां देश की सिर्फ 29% आबादी रहती है। इस मामले में उत्तर और पूर्वोत्तर राज्यों की हालत खराब है।
लैंगिक असमानता । देश की ट्रांसप्लांट प्रणाली में भी लैंगिक असमानता दिखती है। डोनर्स में करीब दो-तिहाई महिलाएं (मां या पत्नी) हैं, लेकिन जब उन्हें ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ती है तो उनके लिए डोनर मिलना मुश्किल हो जाता है। सरकार ने कई AIIMS में ट्रांसप्लांट सेवाएं बढ़ाई हैं।
निगरानी का अभाव । इसके अलावा, एक और बड़ी चुनौती मानव तस्करी की भी है। अक्सर गरीबी और भारी कर्ज से जूझ रहे लोगों को तस्कर निशाना बनाते हैं और पैसों का लालच देकर उनके अंग निकाल लिए जाते हैं। किडनी की सबसे ज्यादा तस्करी की जाती है। इसे रोकने के लिए सख्त कानून हैं, लेकिन मुकम्मल निगरानी के अभाव में रैकेट चलाने वाले अक्सर रिश्तेदार होने का फर्जी प्रमाणपत्र बनवाकर निजी अस्पतालों को चकमा देते हैं। सरकार की नई प्रणाली निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, लेकिन असल चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है जहां मरीज की जरूरत का ख्याल रखा जाए और इसमें शहर, पैसा या जेंडर बाधा न बने।